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Mahakumbh 2005: “भूले-भटके शिविर” की स्थापना की अनोखी कहानी

देवरिया। महाकुंभ 2025 में हर रोज करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कुंभ(Mahakumbh 2005) ही वह जगह होती है जहां हर रोज लोग सैकड़ों की संख्या में अपनों से बिछड़ते भी हैं। कुंभ में बिछड़ना भारत में एक तरह की कहावत ही बन गई है। कहा जाता है कुंभ होता ही है बिछड़ने के लिए। इस बार कुंभ में AI की मदद की बिछड़ों को मिलाने का काम हो रहा है। लेकिन क्या आपको बता है सालों से कुंभ में बिछड़े हुए को मिलाने का काम जिन्होंने किया था उन्हें “भूले भटके बाबा” के नाम से याद किया जाता है। उन्होंने हर कुंभ (Mahakumbh 2005) में हजारों भटके लोगों को अपनों से मिलाया और कितनों को घर पहुंचाया है। आज उनके बाद उनके बेटे उनकी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

कौन हैं “भूले भटके बाबा”?

भूले भटके बाबा का असली नाम राजा राम तिवारी था। उनका काम ही था हर कुंभ (Mahakumbh 2005) में भूले भटके लोगों को अपनों से मिलाना। इसलिए उनका नाम भूले भटके बाबा रख दिया गया था। यह काम वो पूरी तरह से सेवार्थ भाव से करते थे। उन्होंने कई लोगों को उनके घर तक पहुंचाया था। भूले भटके बाबा ने सन 1946 में लगे कुंभ से यह काम शुरु किया था। 2016 में बाबा का देहांत हो गया लेकिन उनके इस धर्मार्थ काम को उनके बेटे उमेश तिवारी उतनी ही शिद्दत से कर रहे हैं और अपने पिताजी के इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

कैसे मिली यह काम करने की प्रेरणा?

भूले भटके बाबा को इस काम को शुरु करने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। साल 1946 में जब प्रयागराज में कुंभ का आयोजन हुआ था तब एक बुजुर्ग महिला अपने परिवार से भटक गई थीं। तब राजा राम ने बुजुर्ग महिला को उनके घर तक पहुंचाया था। उस समय उस महिला की चेहरी की खुशी देखकर राजा राम को आगे भी इस काम को करने की प्रेरणा मिली। उसके बाद हर साल वो कुंभ में “भूले-भटके शिविर” लगाने लगे जहां वो लाउड स्पीकर से भटके लोगों का नाम पुकारते थे और जब तक उनके परिजन उन्हें लेने ना आ जाएं उन्हें अपने शिविर पर ही रखते थे। इस बार भी कुंब 2025 में भूले-भटके शिविर आपको देखने को मिल जाएगा। जहां राजा राम के बेटे भटके लोगों को परिवार से मिला रहे हैं। वो इस सेवा के लिए किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लेते हैं।

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