देवरिया। सावन का महीना शुरू हो गया है। पहले सोमवार को देशभर के मंदिरों में श्रद्वालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। भक्त भगवान शिव को प्रिय इस पावन महीने में उन्हें प्रसन्न करने के लिए पूजा पाठ और भजन कीर्तन करते हैं। वैसे तो शिव जी को सबसे आसानी से खुश होने वाले देवता माना जाता है। कहा जाता है भोले बाबा एक लोटा जल चढ़ाने से ही अपनी कृपा भक्तों पर बरसाते हैं। सावन में होने वाली कांवड़ यात्रा को भी शिव की भक्ति का एक माध्यम माना जाता है। इस यात्रा में श्रद्धालु कांवड़ में गंगा मैया का जल लेकर नंगे पांव शिवालयों में जाते हैं और उन्हें गंगाजल अर्पित करते हैं। आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा का क्या महत्व है और इसे लेकर शास्त्रों में किस तरह के नियम का उल्लेख किया गया है।

इस यात्रा को कांवड़ यात्रा क्यों कहते हैं

कांवड़ यात्रा का नाम साथ लेकर चलने वाले कांवड़ की वजह से पड़ा है। कांवड़ बांस की एक लकड़ी होती है जिसे फूलों और रंग बिरंगे कपड़ों से सजाया जाता है। इसके दोनों छोर पर रस्सी के सहारे टोकरियां या कोई पात्र होता है जिसमें भक्त गंगाजल या किसी पवित्र नदी का जल भरते हैं। बांस के कांवड़ को अपने कंधे पर ही लटका कर श्रद्धालु शिवालय तक पहुंचते हैं और फिर अपने कांवड़ में रखकर लाए गए पवित्र जल को शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। भक्त जो कांवड़ को अपने कंधे पर रखकर यात्रा करते हैं उन्हें कांवड़िया कहते हैं। कांवड़ियों को अपनी इस पूरी यात्रा के दौरान सात्विक जीवन के नियम का पालन करना होता है। कांवड़ यात्रा के मार्ग पर लोग इनकी सेवा के लिए तैयार होते हैं साथ ही कांवड़ियों पर फूल भी बरसाए जाते हैं। क्योंकि कांवड़िए खुद एक शुभ काम की लिए जा रहे होते हैं इसलिए इनकी सेवा को भी शुभ माना जाता है।

कठिन है कांवड़ यात्रा का नियम

आजकल कांवड़ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ गई है। छोटे-छोटे बच्चे भी अपने गांव और शहर के आसपास के शिवायलों तक कांवड़ यात्रा करके जल अर्पित करने निकलते हैं। लेकिन कांवड़ यात्रा एक आध्यात्मिक यात्रा है और शास्त्रों में इसके लिए कठिन नियम का जिक्र किया गया है। कांवड़ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु को पूरी यात्रा भर एक योगी की तरह नियमों का पालन करना होता है। कांवड़ यात्रा को नंगे पैर चलकर जाने का विधान है। पूरी यात्रा के दौरान भक्तों को शिव नाम का जाप करते जलना चाहिए। यात्रा में किसी तरह के तामसिक भोजन का सेवन नहीं किया जा सकता साथ ही मांस मदिरा या किसी भी तरह के नशे का सेवन पूरी तरह से वर्जित होता है। इस दौरान तन के अलावा मन को भी पूरी तरह से सात्विक रखना होता है। एक कांवड़िये के मन में किसी तरह के काम या लोभ की भावना नहीं आनी चाहिए। अपनी यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को अपशब्द का उपयोग करना भी पूरी तरह से वर्जित है। यात्रा शुरु होने के बाद कांवड़ को किसी भी स्थान पर जमीन पर नहीं रखा जा सकता। रात्री विश्राम के दौरान भी कांवड़ को किसी ऊंचे स्थान पर ही रखा जाता है। अगली सुबह स्नान के बाद ही कांवड़ को वापस उठाया जाता है। पूरी कांवड़ यात्रा के दौरान एक कांवड़िए को तन और मन से पूरी तरह से पवित्र होना चाहिए तभी उसकी कांवड़ यात्रा सफल मानी जाती है।

जानिए क्या है कांवड़ यात्रा का इतिहास

माना जाता है कि सबसे पहले कांवड़ यात्रा भगवान शिव के परम भक्त भगवान परशुराम ने निकाली था। कहा जाता है कि वे सबसे पहले ‘पुरा महादेव’ गए थे। पुरा महादेव बागपत जिले में पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लेकर भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। उस समय श्रावण मास चल रहा था। तब से इस परंपरा को निभाते हुए भक्त श्रावण मास में कांवड़ यात्रा निकालते हैं।

मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा कहां-कहां होती है

हालांकि आजकल सभी शिवालयों में कांवड़ लेकर जलाभिषेक किया जाता है लेकिन मुख्य रूप से भक्त गंगा, नर्मदा, शिप्रा आदि नदियों से जल लेते हैं और पैदल यात्रा करके शिवालयों में जल चढ़ाते हैं। उत्तराखंड में कांवड़िया हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्री से गंगा जल भर कर इसे अपने अपने इलाके के शिवालयों में स्थित शिवलिंगों पर अर्पित करते हैं। वहीं मध्यप्रदेश में इंदौर, देवास, शुजालपुर आदि जगहों से कांवड़ यात्री वहां की नदियों से जल लेकर उज्जैन के शिवालयों में जल अर्पित करते हैं। देश में सबसे ज्यादा और प्राचीन समय से जिन स्थानों में कांवड़ यात्रा चली आ रही है उनमें मेरठ के औघड़नाथ, पुरा महादेव, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर, झारखंड में बैजनाथ मंदिर और बंगाल के तारकनाथ मंदिर शामिल हैं।