देवरिया। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मनाए गए दीपोत्सव के बाद अब वाराणसी में देव दिवाली के दिन धूमधाम से दीपोत्सव मनाया जाएगा। दिवाली के 15 दिन बाद हिंदू महीने कार्तिक की पूर्णिमा को देव दिवाली मनाई जाती है। इस बार देव दिवाली पर वाराणसी में 15 लाख दिए जलाकर दीपोत्सव भी मनाया जाएगा।
देव दिवाली से जुड़ी पौराणिक कथा
देव दिवाली से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने इस दिन त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसी खुशी में देवता जीत का उत्सव मनाने के लिए धरती पर उतरते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार यह त्यौहार शिव पुत्र भगवान कार्तिक की जयंती के उपलक्ष्य पर भी मनाया जाता है। कहा जाता है इस दिन स्वयं देवी-देवता धरती पर उतरकर दिवाली मनाते हैं।
इस दिन नदियों में स्नान का है महत्व
कहा जाता है इस दिन ब्रम्ह मुहुर्त में नदी या तालाब में नहाने से पुण्य मिलता है। वाराणसी में भी लोग बड़ी संख्या में कार्तिक स्नान के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस दिन पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन वाराणसी देवताओं का स्वर्ग बन जाता है क्योंकी सारे देवी देवता स्वर्ग से उतरकर काशी में इकट्ठा हो जाते हैं।
क्या है देव दिवाली पर पूजा का मुहुर्त?
देव दिवाली के दिन पूजा के लिए अलग-अलग शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:58 से 05:51 के बीच
प्रातः सन्ध्या- सुबह 05:24 से 06:44 के बीच
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:44 से 12:27 के बीच
विजय मुहूर्त- दोपहर 1:53 से 02:36 के बीच
गोधूलि मुहूर्त- शाम 05:27 से 05:54 के बीच
सायाह्न सन्ध्य- शाम 05:27 से 06:47 के बीच
अमृत काल- शाम 5:38 बजे से 7:04 बजे के बीच
देव दिवाली पर दीपदान का है महत्व
देव दिवावी के दिन दीप दान का बड़ा महत्व है। इस दिन दीपक जलाकर उसे किसी उचित स्थान पर रखना दीपदान कहलाता है। दीपदान के लिए दिया जलाकर उसे मंदिरों में या नदी में प्रवाहित करना चाहिए। ऐसा करना ईश्वर के सामने अपनी मन्नत पूरी करने का निवेदन माना जाता है। दीप दान नदी, तालाब, ब्राह्मण के घर, जमीन पर या धान के ऊपर दिया रखकर कर सकते हैं।