कोप्पल। यह कहानी कर्नाटक के उस जिले कोप्पल की महिलाओं की है, जो देश भर में केले के तनों से कपड़े बनाने के लिए जाना जाता है। यहां स्थानीय गांवों की कुछ महिलाओं ने वह कर दिखाया है, जिससे तुंगभद्रा नदी में होने वाला प्रदूषण थम गया और लोगों को प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने की प्रेरणा और सबक दोनों मिला 9Tungabhadra river pollution)। इन महिलाओं ने तुंगभद्रा नदी किनारे लोगों के छोड़े गए कपड़ों से बैग बना दिए। उसके बाद इन्हें मुफ्त बांट रही हैं। साथ ही लोगों से अपील कर रही हैं कि वे प्लास्टिक की पन्नियों का इस्तेमाल न करें। इससे नदी किनारे छोड़े गए इन कपड़ों का निपटारा होने के साथ-साथ प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक भी लग रही है।

व्रत-मन्नत पूरी होने के बाद लोग स्नान कर तुंगभद्रा में ही कपड़े छोड़ जाते हैं
दरअसल, हनुमान जयंती के अवसर पर आयोजित उत्सव के दौरान श्रद्धालु व्रत या मानी गई कोई मन्नत पूर्ण होने के बाद अपने कपड़े तुंगभद्रा नदी के किनारे छोड़ जाते हैं। ये कपड़े नदी या फिर नदी तट पर फैले रहते हैं और नदी को गंदा करते हैं। लेकिन इस बार हालात बदल गए। स्थानीय महिला समूह संजीविनी से जुड़ी महिलाओं ने नदी तट से इन्हें इकट्ठा किया। उसके बाद इन्हें अच्छी तरह धोकर हैंडबैग तैयार कर दिया।

प्रदर्शनी के जरिए कर रहे जागरूक
लोग प्लास्टिक बैग और पन्नियों का इस्तेमाल न करें, इसलिए अंजनाद्री पहाड़ी के पास प्रतीकात्मक प्रदर्शनी भी लगाई गई। यहां पहुंचे तहसीलदार यू. नागराज ने कहा कि यह पहल लोगों में प्रदूषण के प्रति जागरूकता बढ़ा रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

महिलाओं को मिला हुनर, बढ़ा आत्मविश्वास
इस पहल का एक अहम पहलू महिला सशक्तिकरण भी है। साहस संस्था के सहयोग से महिलाओं को कपड़ा संग्रहण, सफाई और बैग निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। इससे उन्हें न केवल नई आजीविका से जुड़ने का अवसर मिला, बल्कि सामूहिक कार्य के जरिए आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान भी मजबूत हुई है।

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