देवरिया। नवरात्री के पावन 9 दिनों का आज दूसरा दिन है। इन नौ दिनों में आपको उत्तर प्रदेश के अलग-अलग सिद्ध देवी में मंदिरों की प्रसिद्धी और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में बताएंगे। प्रदेश के प्रमुख तीर्थ वाराणसी के काशी विश्वनाथ तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। लेकिन क्या आपको पता हैं यहां पर काशी विश्वनात की अर्धांगिनी यानी मां पार्वति का भी एक मंदिर स्थापित है जिसे ‘विशालाक्षी देवी’ (vishalakshi temple) के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक और लोक मान्यताओं के बारे में।  

मां पार्वती का रूप है विशालाक्षी देवी

मां विशालाक्षी (vishalakshi temple) का मंदिर गंगा तट के मीरघाट पर स्थित हैं, इसे गौरी मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर माता पार्वती का स्वरूप है और 52 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार जब सती माता ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह किया, तो भगवान शिव उनके शरीर को लेकर शोकग्रस्त होकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित किया। जहां-जहां वे अंग गिरे, वहां शक्ति पीठ स्थापित हुए।

वाराणसी में सती माता के कर्ण कुंडल गिरे थे, इसी कारण यहां विशालाक्षी शक्ति पीठ की स्थापना हुई। यही कारण है कि इस मंदिर का महत्व दूसरे मंदिरों की तुलना में ज्यादा है। श्रद्धालु मानते हैं कि यहां माता के दर्शन से जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि आती है।

धार्मिक मान्यताएं और उत्सव

विशालाक्षी मंदिर (vishalakshi temple) सिर्फ एक शक्ति पीठ ही नहीं बल्कि महिलाओं की आस्था का प्रमुख केंद्र भी है। यहां कजली तीज का पर्व विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास में आता है और भारतीय स्त्रियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा चैत्र और अश्विन माह में नवरात्रि का पर्व भी यहां बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि के दौरान माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है और श्रद्धालु दिन-रात भजन, कीर्तन और आराधना में लीन रहते हैं।

सभी मनौतियां पूरी करती हैं मां विशालाक्षी

विशालाक्षी मंदिर से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि अविवाहित कन्याएं यहां मनचाहा वर पाने के लिए प्रार्थना करती हैं, संतानहीन स्त्रियां संतान प्राप्ति की कामना करती हैं और दुर्भाग्यग्रस्त लोग अपने जीवन में सौभाग्य की अपेक्षा से यहां आते हैं। भक्तों का विश्वास है कि मां विशालाक्षी हर श्रद्धालु की सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनती हैं।

मंदिर की वास्तुकला और संरचना

विशालाक्षी मंदिर की वास्तुकला भी अपने आप में अद्वितीय है। मंदिर का मुख्य द्वार सुंदर गोपुरम से सजा हुआ है। मुख्य द्वार पर देवी लक्ष्मी का सुंदर स्वरूप उकेरा गया है। जिसमें देवी लक्ष्मी कमल पर विराजमान हैं और दोनों ओर हाथी उन्हें जल अर्पित कर रहे हैं। (vishalakshi temple) मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही शिवलिंग, नागों और भगवान गणेश की मूर्तियां दिखाई देती हैं। यहां पर आदिशंकराचार्य की एक प्रतिमा भी स्थापित है, जो इस मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ाती है। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से बनी मां विशालाक्षी की अद्भुत प्रतिमा है। उनकी दाहिनी भुजा में कमल है और बाईं भुजा आशीर्वाद मुद्रा में है। माता का यह स्वरूप यहां आने वाले श्रद्धालुओं को काफी आकर्षित करता है। मंदिर के एक हिस्से में नवग्रहों की भी स्थापना की गई है।