व्हीलचेयर से शब्दों तक... जिजीविषा जोशी बनीं देश की सबसे कम उम्र की प्रेरणादायक लेखिकाजिजीविषा जोशी बनीं देश की सबसे कम उम्र की प्रेरणादायक लेखिका

देवरिया। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत… राजस्थान के भीलवाड़ा की 17 साल की बेटी जिजीविषा जोशी ने इसे साबित कर दिखाया है। उन्होंने 15 दिन के अंदर ही लेखन के क्षेत्र में दो प्रतिष्ठित सम्मान ‘Deshratan Award’ और ‘Indian Glory Award’ हासिल किया है। 14 दिसंबर 2025 को दिल्ली में उन्हें ‘Indian Glory Award’ और 23 दिसंबर 2025 को भारत मंडपम में उन्हें ‘Deshratan Award’ दिया गया। वे देश की सबसे कम उम्र की प्रेरणादायक लेखिका बन गई हैं।

शारीरिक कमजोरी को मानसिक ताकत से हराया

बड़ी बात यह है कि जिजीविषा मस्कूलर डिस्ट्रॉफी जैसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी के कारण उनके मसल्स लगातार कमजोर होते गए और आज वह न तो खड़ी हो सकती हैं और न ही चल सकती हैं। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी अपनी मानसिक शक्ति पर हावी नहीं होने दिया।

12वीं में 85% नंबर लेकर आईं

जिजीविषा ने भीलवाड़ा के ही विवेकानंद केंद्रीय विद्यालय में व्हीलचेयर के सहारे अपनी पढ़ाई जारी रखी। ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर स्थिति से जूझते हुए भी उन्होंने 12वीं में 85 प्रतिशत अंक हासिल किए। ऐसी बीमारियों से जूझते हुए अपने नाम को सार्थक करते हुए जिजीविषा ने लेखन को अपनी ताकत बनाया। उनकी पहली किताब ‘Door to the Fifth dimension’ ने उन्हें नई पहचान दिलाई।

डॉक्टर ने कह दिया था- जिंदगी में कुछ खास नहीं कर पाएंगी

जिजीविषा के जीवन में सबसे कठिन मोड़ तब आया, जब एक उनके डॉक्टर ने ही कह दिया था कि ये जिंदगी में कुछ खास नहीं कर सकेंगी। उस पल उनका मन जरूर टूटा, लेकिन उसी क्षण उन्होंने हार न मानने का फैसला भी किया। इसी संघर्ष के दौर में उन्होंने लेखन को अपनी आवाज और अपनी ताकत बनाया। जिजीविषा की पहली पुस्तक Door to the Fifth Dimension ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई। नोएडा के एक पब्लिकेशन हाउस से प्रकाशित यह किताब अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है और पाठकों के बीच काफी चर्चा में रही।

मां बनी संबल और बेटी को दिखाया लेखक बनने का रास्ता

जिजिविषा के इस संघर्ष की सबसे बड़ी संबल उनकी मां कल्पना जोशी बनीं। पेशे से शिक्षक उनकी मां ने उन्हें हार न मानने की​ हिम्मत दी और इस बात का हौसला भी कि दुनिया वैसी ही होगी जैसी हम चाहेंगे। इसलिए अपनी दिक्कतों के बाद भी अपने लिए रास्ता बनाने की कोशिश कभी नहीं छोड़नी चाहिए। उनकी मां कहती हैं- शारीरिक असक्षमता किसी की पहचान नहीं होती। मजबूत आदतें, सकारात्मक सोच और अडिग संकल्प के सहारे हर चुनौती को पार किया जा सकता है। उनकी कहानी न सिर्फ दिव्यांगजनों, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में किसी संघर्ष से गुजर रहा है।

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