देवरिया। प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई ने अपने जीवन के 67 वर्ष पूरे किए। पंडवानी और तीजन बाई एक-दूसरे के पर्याय हैं। इस विधा में, इस कला में तीजन जैसा कोई और नहीं। वे एक ऐसी कलाकार हैं, जिनकी कला ने पूरी दुनिया को उनका मुरीद बना दिया। संघर्ष की हद पार कर उन्होंने सामाजिक दीवारों को तोड़ा और बिना किसी सपोर्ट के पद्म भूषण तीजन बाई बन गईं। तीजन वो नाम हैं, जिन्होंने अपने हुनर को चूल्हे की आग में जलते नहीं देखा बल्कि वो खुद कला की आग में तपीं और सोना बनीं।
बचपन से ही शुरू हो चुका था संघर्ष
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को भिलाई के गनियारी में हुआ था। उनके माता-पिता बेहद गरीब पारधी समाज से ताल्लुक रखते थे। बड़ी मुश्किलों से तीजन बाई और उनके 4 छोटे भाई-बहनों का पेट भरता था। ऐसी संघर्ष से भरी स्थिति में स्कूल जाना तो दूर तीजन बाई कभी विद्यालय के दरवाजे तक नहीं पहुंची। पंडवानी की तरफ उनकी ललक शायद उन्हें ईश्वर से उपहार के रूप में मिली थी। तीजन अपने नाना बृजलाल को बचपन से ही महाभारत की कहानियों को गीत के रूप में गाते हुए देखती थीं। लेकिन मां को तीजन का पंडवानी गाना बिल्कुल पसंद नहीं था। एक बार तीजन बाई ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि पंडवानी गाता देख मां गुस्से से अपनी उंगलियां उनके गले तक डाल देतीं ताकि तीजन कभी गा ही ना सकें। लेकिन उस छोटी तीजन को पद्मविभूषण डॉक्टर तीजन बाई तक का सफर पूरा करना था, वो कहां रुकने वाली थीं।
कपालिक शैली में पंडवानी गाकर तोड़ी परंपरा
परिवार के विरोध के बाद भी तीजन बाई ने अपने नाना को ही अपना गुरु बनाया। उनके नाना बृजलाल ने भी उनका साथ दिया और अपनी कला उन्हें विरासत के रूप में दी। बाद में उमेश सिंह देशमुख ने तीजन का पंडवानी के प्रति लगाव देखकर उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया। तीजन बाई ने 13 साल की उम्र में पहली बार मंच पर पंडवानी का प्रदर्शन किया। ये वो समय था जब पंडवानी कला पर पुरुषों का अधिपत्य माना जाता था। महिलाएं गाती भी तो वेदमती शैली में यानी बैठकर अपनी प्रस्तुति देती थी। ऐसे समय में तीजन ने पहली बार कपालिक शैली में पंडवानी की प्रस्तुति दी।। कपालिक शैली में पुरुष खड़े होकर और पूरे हाव भाव के साथ प्रस्तुती देते थे। तीजन को अपनी शैली के लिए भी विरोध झेलना पड़ा था।
पति का घर छोड़ा लेकिन पंडवानी नहीं
तीजन बाई की शादी 12 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। ससुराल में भी बहु का पंडवानी गाना बिल्कुल भी मंजूर नहीं था। ससुराल वाले और उनकी बिरादरी ने इस बात का कड़ा विरोध किया कि तीजन बाई खड़े होकर, हाव-भाव और नृत्य के साथ कपालिक शैली में पंडवानी का गायन करती है। लेकिन तीजन बाई अपनी कला से समझौता करना किसी भी कीमत पर गंवारा नहीं था। वो रात में अपने काम निपटाती फिर पंडवानी गाने चली जाती थीं। एक बार वो मंच पर पंडवानी की प्रस्तुति दे रही थी तभी उनके पति गुस्से में पहुंचे और तीजन बाई पर हाथ उठा दिया। उस वक्त तीजन भीम की प्रसंग का वीर रस में प्रस्तुति दी रही थीं। गुस्से में उन्होंने अपने तंबूरे को ही गदा बनाया और अपने पति को दे मारा। उस दिन से उन्होंने अपने पति का घर भी छोड़ दिया। अकेली झोपड़ी में रहीं मांगे हुए बर्तनों, कपड़ों से काम चलाया पर पंडवानी नहीं छोड़ी।
हबीब तनवीर से मिलकर बदली जिंदगी
तीजन बाई की अपनी कला के प्रति समर्पण और कर्मठता ने भी एक दिन फल दिया। जब उनकी मुलाकात प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर से हुई। उन्होंने तीजन बाई को इंदिरा गांधी के सामने पंडवानी गाने का मौका दिया। उसके बाद तीजन बाई ने पलट कर नहीं देखा। देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन किया और उसके बाद उनकी प्रसिद्धी आसमान छूने लगी। 1980 में उन्होंने सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, टर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरिशस की यात्रा की और वहां पर प्रस्तुतियां दी। तीजन को उनकी कला के लिए 1988 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। 3 अप्रैल, 2003 को भारत के राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम द्वारा पद्म भूषण, मध्यप्रदेश सरकार का देवी अहिल्याबाई सम्मान, संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली से सम्मान, 1994 में श्रेष्ठ कला आचार्य, 1996 में संगीत नाट्य अकादमी सम्मान, 1998 में देवी अहिल्या सम्मान, 1999 में इसुरी सम्मान प्रदान किया गया। 27 मई, 2003 को डी-लिट की उपाधि से छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित किया गया। डॉ। तीजन बाई बीएसपी में डीजीएम भी थीं और सितंबर 2016 में रिटायर हुई। 2017 में तीजन बाई को खैरागढ़ यूनिवर्सिटी डिलीट की उपाधी दी। संगीत विवि खैरागढ़ में तीजन बाई को डिलीट की उपाधि दी गई थी। 27 मई, 2003 को डीलिट की उपाधि से छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित किया गया। इसके अलावा महिला नौ रत्न, कला शिरोमणि सम्मान, आदित्य बिरला कला शिखर सम्मान 22 नवम्बर, 2003 को मुंबई में प्रदान किया गया।
कुछ सालों से बीमार हैं तीजन बाई
पंडवानी को विदेशों तक प्रसिद्धी दिलाने वाली और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करने वाली तीजन बाई की तबीयत कुछ सालों से नासाज रहने लगी है। जुलाई 2023 में पैरालिसिस का अटैक आने के बाद उनका ज्यादातर समय घर पर ही बीतता है। डॉक्टर ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी है। बीमार होने के बाद भी उनके चेहरे का वो तेज और आत्मविश्वास कम नहीं हुआ है जो पंडवानी की प्रस्तुति के समय रहता था। उन्होंने अपनी इस कला को अपने की शिष्यों को सिखाया है ताकी वो इसे आगे बढ़ा सकें। आज उनके शिष्य अच्छे पदों पर भी पहुंच चुके हैं लेकिन पंडवानी को कला के रूप में संजोए हुए हैं। आपको बता दे पंडवानी महाभारत की कथा पर आधारित लोक गाथा है इसे छत्तीसगढ़ी महाभारत भी कहा जा सकता है। इसके मुख्य नायक भीम और मुख्य नायिका द्रोपदी को बताया गया है। पंडवानी को गायन और नृत्य दोनों की सहायता से प्रस्तुत किया जाता है।