देवरिया।आजादी के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर केकुपवाड़ा जिले के टीटवाल गांव में एलओसी पर स्थित मां शारदा देवी के मंदिर में भी नवरात्र की पूजा पूरे विधि-विधान से हुई। यहां पर पूरे 75 साल के बाद नवरात्र के पहले दिन से ही पूजा शुरु की गई। माता के इस ऐतिहासिक पूजा में शामिल होने देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हुए थे। अब हर साल दोनों ही नवरात्र में माता की पूजा और सेवा होती रहेगी।पूजा में शामिल होने हम्पी के स्वामी गोविंदानंद सरस्वती भी पहुंचे थे। स्वामी गोविंदानंद अपने अनुयायियों के साथ कर्नाटक में भगवान हनुमान की जन्मस्थली किष्किंधा से रथ यात्रा कर टीटवाल गांव पहुंचे। पूजा के दौरान कुछ कश्मीरी पंडित तीर्थयात्री भी मौजूद रहे, जिनमें प्रसिद्ध थिएटर आर्टिस्ट ए.के. रैना भी शामिल थे। रैना ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में भी काम किया है।


1947 में आदिवासियों ने जला दिया था मंदिर
टीटवालगांव में इस प्राचीन मंदिर और एक गुरुद्वारे को 1947 में आदिवासी हमलावरों ने जला दिया था। उसी स्थान पर मां शारदा का नया मंदिर बनवाया गया। जिसकी प्राण प्रतिष्ठा दक्षिण भारत के बड़े संतों ने पूरे रीति रिवाज से मार्च 2023 में कीथी। इस मंदिर को गृहमंत्री अमित शाह ने लोकार्पित किया था।


नवरात्री की पूजा होने पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा-“यह गहन आध्यात्मिक महत्व की बात है कि 1947 के बाद पहली बार, इस वर्ष कश्मीर के ऐतिहासिक शारदा मंदिर में नवरात्र पूजा आयोजित की गई है। वर्ष की शुरुआत में, चैत्र नवरात्रि पूजा मनाई जाती थी और अब शारदीय नवरात्रि पूजा के मंत्र मंदिर में गूंजते हैं। मैं 23 मार्च 2023 को जीर्णोद्धार के बाद मंदिर को फिर से खोलने के लिए भाग्यशाली था। यह न केवल शांति की वापसी का प्रतीक हैबल्कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारे देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक लौ को फिर से जगाने का भी प्रतीक है।”

मां शारदा का है बड़ा आध्यात्मिक महत्व
मां शारदा देवी का यह मंदिर हिंदुओं और खासकर कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। मां शारदा से आशीर्वाद लेने पूरे देश से लोग कुपवाड़ा आते हैं। इस मंदिर को 18 महाशक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर हिंदू देवी माँ शारदा को समर्पित है, जिन्हें और बुद्धि की देवी, सरस्वती का अवतार माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, मंदिर का निर्माणपांडवों के द्वारा अपने वनवास के दौरान किया गया था। यह भी माना जाता है कि 8वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजा ललितादित्य मुक्तपीड ने बाद में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यह भी मान्यता है कि यहीं पर मां सती का दाहिना हाथ गिरा था।