देवरिया। राघव, तुम्हें प्राणों से भी प्यारी है न अवधपुरी…फिर अपने भाग्य में ये वनवास क्यों लिखे थे ? हे रघुकुलनंदन, महादेव कहते हैं कि- होइहि सोइ जो राम रचि राखा। फिर अपने लिए इतने कष्ट क्यों रचे तुमने ? सच कहो, हमारे लिए न ? सब कह रहे हैं 500 साल से आप दूसरा वनवास काट रहे थे। फिर अपने लिए ये कठिन विधि क्यों चुनी ? सदियों से प्रेम, सत्य और मर्यादा का पाठ सिखाने वाले राम तुमने अपनी मिट्टी से दूर रहना हमारे लिए चुना न ?

हे कौशल्या के लला तुम भगवन् नहीं जीवन हो। जन्म की राम-राम से लेकर मृत्यु के राम नाम सत्य तक। हम नई आंखों ने तुम्हें बड़े-बूढ़ों की बातों में सुना है। तुम्हें रामचरित मानस से जाना है। रामानंद की कृति में देखा, रविन्द्र जैन के संगीत में सुना ह। तुम्हारी कथा सुनी, तुम्हारी व्यथा सुनी। तुम जगजीत सिंह के गले से निकले, तुम्हें मोहम्मद रफी ने गाया।

तुम हर रूप में भाए रघुवर। तुमने धैर्य सिखाया। परिवार से प्रेम सिखाया। तुमने सिखाया बड़ा वही, जिसके साथ कोई छोटा न लगे। तुमने मित्रता सिखाई, तुमने शत्रुता की शुचिता सिखाई। तुमने सिखाया पुत्र-पुत्री होना। तुमने भाई का कर्तव्य सिखाया। तुम मर्दाया की परिभाषा बने दशरथनंदन। हे सिया के करुणानिधान ! तुमने दया, क्षमा और शिष्टाचार का पाठ पठाया। हे शाश्वत ! तुम्हें भज लेना ही हमारा मनुष्य होना है। श्रीराम, तुम्हें अंतस में उतार लेना की मनुष्यता का प्रमाण है।

हे शाश्वत! तुम तुलसी का दोहा हो, अल्लामा की नज़्म हो। आज तुम्हें एकटक निहारा है हिन्दुस्तान ने। भारत के भाल पर ‘राम’तिलक हुआ है। अपने आराध्य शिव की तरह वनवास का विष तुमने हमें संवारने के लिए पिया है राम। तुम सा सरल होना कितना कठिन है। बालक रूप में यूं लग रहा है कि निहारते रहें तुम्हें। मन कर रहा है माता कौशल्या से कहें कि लड्डू खिला दें अपने लला को, थक गए होंगे दर्शन देते-देते। मन कर रहा है कि कहें जाओ रघुवर, अपनी प्राणनगरी घूम कर आओ। देखो तुम्हारे स्वागत की प्रतीक्षा जब पूर्ण हुई है, शब्द कम पड़ गए हैं। और सुनो राजीवलोचन अब ओझल मत होना। आज तुम्हारी नहीं भारत की आत्मा प्रतिष्ठित हुई है प्राण समेत।