देवरिया। श्री कृष्ण की नगरी मथुरा की प्राचीन और प्रसिद्ध कला ‘सांझी क्राफ्ट’ को देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी पहचान मिलेगी। सांझी क्राफ्ट को जीआई टैग मिल गया है। डीएम शैलेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि- “ग्लोबल मार्केट में अब ब्रज की इस कला को अलग पहचान मिलेगी। कामगारों को इसका लाभ मिलेगा। ब्रज के लिए यह गर्व की बात है।”
राधारानी के प्रेम को दर्शाती है यह कला
वैसे तो सांझी कला का एक तरह की साज-सज्जा से जुड़ी हुई कला है, लेकिन इस की सबसे विशेष बात यह है कि इस कल के माध्यम से राधारानी और कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है। यह कला पुष्टिमार्गीय व वल्लभ कुल से संबंधित है। मथुरा के रहने वाले मोहन वर्मा एवं उनके परिवार की लगन का ही परीणाम है कि आज सांझी को वह पहचान मिली जिसकी यह कला योग्य है। सांझी कला ब्रज की एक अनेक पहचानों में से एक मानी जाती है लेकिन लोगों को इसकी जानकारी कम होने की वजह से यह अपनी पहचान खो रही थी।
पीएम मोदी ने जो बाइडन को भेंट की थी सांझी कला
तीन दशक से मंदिरों तक सीमित रही सांझी कला को जीवंत करने के लिए द ब्रज फाउंडेशन ने करीब दस साल पहले प्राचीन ब्रह्मकुंड पर सांझी मेले का आयोजन किया था। ब्रज एवं श्रीकृष्ण पर शोध कर रहे महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि सांझी कला की शुरुआत ब्रज में हुई। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी इस कला के जानकार अब कम हैं। इस प्राचीन कला को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2022 में वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई, जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को सांझी की कृति भेंट की थी। उस वक्त सांझी पेपर कटिंग की कृति मथुरा के स्वर्गीय चैनसुख दास वर्मा के हाथों की बनाई थी।
पुराणों में भी मिलता है उल्लेख
सांझी कला की प्राचीनता और महत्व का अंदाजा इसी बात लगाया जा सकता है कि इस कला का उल्लेख हमें पुराणों में भी देखने को मिलता है। वृंदावन में सांझीकारों में राधारमण मंदिर और राधावल्लभ मंदिर के सेवायतों के अलावा भट्ट घराना जुड़ा है। पुराणों में उल्लेख है कि द्वापर में शाम के समय जब भगवान श्रीकृष्ण गोचारण करके आते थे, तो ब्रज गोपियां उनके स्वागत के लिए फूलों की चित्रकला सजाकर स्वागत करती थीं। तभी से ब्रज में सांझी कला की शुरुआत पड़ी। सांझी को स्वागत में बनाई जाने के कारण इस कला का नाम सांझी कला पड़ा।