देवरिया। काशी विश्वनाथ की नगरी जिसे हम काशी, बनारस और वाराणसी के नाम से जानते हैं। यह घाटों की भी नगरी है। यहां प्रसिद्ध घाटों में सबसे रहस्यमयी और चर्चित घाट है मणिकर्णिका घाट इसे मोक्ष का घाट भी कहा जाता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यहां पर जिस व्यक्ति का अंतिम संस्कार होता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं इस घाट के इतिहास और महत्व के बारे में।
साल के 365 दिन जलती रहती है चिता की अग्नि
कहते हैं मणिकर्णिका घाट पर कभी भी चिता की अग्नि शांत नहीं होती। चौबीसों घंटे यहां चिता जलती रहती है। रोजाना यहां 200 से 300 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। कहा जाता है मणिकर्णिका घाट पर जिनका अंतिम संस्कार होता है वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। कहते हैं जिस दिन इस घाट पर एक भी चिता नहीं जलेगी वह दिन बनारस के लिए प्रलय का दिन होगा, लेकिन आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने इस घाट को अनंत शांति का वरदान दिया है। पूरे समय चिताओं के जलने के बाद भी इस घाट पर जाकर आपको जीवन के यथार्थ सच का एहसास होगा और असीम शांति महसूस होगी।
घाट से जुड़ी जनश्रुतियां
मणिकर्णिका घाट से जुड़ी कई जनश्रुतियां हैं और पौराणिक कथाएं हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक समय में भगवान विष्णु ने हजारों सालों तक इस घाट पर भगवान शिव की आराधना की थी। भगवान विष्णु की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विष्णु जी से वरदान मांगने को कहा था तब भगवान विष्णु ने शिव से वरदान मांगा था कि जब सृष्टि का विनाश हो तब काशी नष्ट न हो।
भगवान शिव ने मां पार्वती के लिए बनाया था कुंड
एक दूसरी मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु की आराधना से खुश होकर भगवान शिव के साथ मां पार्वती भी साथ आई थीं। तभी विष्णुजी ने यहां पर शिव पार्वती के लिए स्नान कुंड बनाया था जिसे मणिकर्णिका कुंड के नाम जाना जाता है। कहा जाता है कि स्नान के दौरान माता पार्वती के कर्णफूल कुंड में गिर गए थे, जिसे भगवान शिव ने ढूंढ कर दिया था। माता के कर्णफूल के नाम से ही इस कुंड को मणिकर्णिका कुंड नाम मिला। एक दूसरी कथा के अनुसार माता सती का अंतिम संस्कार भी इसी घाट में किया गया था।

मौत के मातम के बीच होता है उत्सव
मृत्यु को जीवन का सबसे बड़ा सत्य माना जाता है और यह शोक का समय होता है। लेकिन काशी का मणिकर्णिका घाट एक ऐसा घाट है जहां जलती चिताओं के बीच उत्सव और नाच गाना होता है। साल में एक दिन यहां पर श्मशान नाथ महोत्सव के दौरान नगर वधुएं पैरों में घुंघरु बांधकर नाच गाना करती हैं। एक तरफ चिताओं से लपटे उठती रहती हैं और दूसरी ओर नगर वधुएं नाच गाकर उत्सव मनाती हैं। ऐसा करते हुए वो भगवान से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें अगले जनम में दोबारा ऐसा जीवन ना मिले। यह उत्सव चैत्र नवरात्र की सप्तमी की रात में होता है। यह परंपरा अकबर काल में आमेर के राजा सवाई मानसिंह के समय से शुरू हुई थी। सवाई मानसिंह ने 1585 में मणिकर्णिका घाट पर मंदिर का भी निर्माण करवाया था।
यहां खेली जाती है चिता की भस्म से होली
वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर रंगभरी एकादशी के अगले दिन मसाने की होली खेली जाती है। माना जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन मां पार्वती का गौना हुआ था, जिसमें उनके ससुराल वालों के अनुरोध पर भूत-प्रेत, चुड़ैल, डाकिनी-शाकिनी, अघोरियों को न्योता नहीं दिया गया था। भगवान शिव उन्हें निराश नहीं करना चाहते और रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन उनके साथ मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म से होली खेलते हैं। इसी परंपरा को निभाने के लिए आज भी रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद मसाने की होली खेली जाती है। इस अनोखी होली को देखने और इसका आनंद लेने के लिए देशभर से लोग इकट्ठा होते हैं। पहले बाबा मसान नाथ की भस्म, अबीर और गुलाल लगाकर आरती की जाती है उसके बाद लोग होली खेलते हैं।