देवरिया : आज साल 2022 के जून महीने का दूसरा और ज्येष्ठ मास का पहला शनिवार है। हर दिन किसी न किसी भगवान के लिए खास दिन होता है। शनिवार का दिन शनिदेव को समर्पित माना गया है। शनिदेव को न्यायाधीश व कर्मफलदाता माना गया है। शनिदेव जातक को उसके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। मान्यता है कि शनिवार के दिन शनिदेव की विधिवत पूजा करने व शनि संबंधित उपायों को करने से शनिदोष का प्रभाव कम होता है।
शनिवार का दिन कर्क, वृश्चिक, धनु, मीन व कुंभ राशि वालों के लिए खास है। कर्क व वृश्चिक राशि वालों पर शनि ढैय्या चल रही है, जबकि कुंभ, मीन व धनु राशि वालों पर शनि की साढ़े साती का प्रभाव है। ऐसे में इन पांच राशि वालों को शनिवार के दिन शनिदेव की विधिवत पूजा करनी चाहिए।
शनिदोष से बचने का उपाय
शास्त्रों के अनुसार प्रति दिन पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाने से शनिदोष का प्रभाव कम होता है। शाम को पीपल के पेड़ के पास सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि शनि साढ़ेसाती के दौरान जो व्यक्ति पक्षियों की सेवा करता है, उस पर शनि का दुष्प्रभाव कम होता है. इसके अलावा शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के दौरान असहाय लोगों की मदद करने से भी लाभ मिलता है। शनिदेव और एकादशी के संयोग में काले तील, काली उड़द और काले वस्त्रों का दान करना शुभ फल देता है।
इस दिन आप किसी गरीब को चप्पल-जूते और छाता दान करें तो यह बहुत ही शुभदायी होता है। आपके इस कार्य से शनि बहुत खुश होते हैं। इस दिन किसी जरूरतमंद को तेल दान करने से बाधाएं खत्म होती हैं।
शनि ग्रह को मजबूत करने का उपाय
- जिन लोगों का शनि ग्रह कमजोर होता है उनको शनि का व्रत करना चाहिए। उसे नीले रंग के कपड़े पहनने चाहिए। साथ ही उन्हें व्रत भी रखना चाहिए। यह व्रत 3, 9 या 16 वर्ष तक कर सकते हैं.
- जिनका शनि कमजोर होता है, उनको भोजन में काले चने, काले तिल का सेवन करना चाहिए। जो लोग शनिवार को व्रत रखते हैं, उनकी बुद्धि और विद्या बढ़ती है। विवाह की देरी दूर होती है। धन स्थिर होता है और यश बढ़ता है।
- तिल, साबुत उड़द दान करने, और चावल गरीबों को खिलाने और स्वयं मूली, पुदीना, हरा प्याज, सतावरी साग आदि खाने से भी शनि ग्रह मजबूत होता है।
कैसी बनती है साढ़ेसाती और ढैय्या
जब किसी जातक की कुंडली में शनि जन्मराशि से द्वादश अथवा प्रथम या द्वितीय स्थान में हों तो यह स्थिति शनि की साढ़ेसाती कहलाती है। शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक गतिशील रहते हैं। इसका प्रभाव एक राशि पहले से एक राशि बाद तक पड़ता है। यही स्थिति साढ़ेसाती कहलाती है। जब गोचर में शनि किसी राशि के चौथे और आठवें भाव में होता है तो यह स्थिति ढैय्या कहलाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान जातक को मानसिक तनाव और शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ता है।