देवरिया। जल-जंगल-जमीन… मुनाफे के लिए इंसान सारे प्राकृतिक संसाधन दांव पर लगाता जा रहा है। ऐसे में पहाड़ बचाने की अनोखी मुहिम बिहार के भागलपुर में चल रही है। यह कोशिश देवगिरी पहाड़ को बचाने (save devgiri mountains) की है। शाहकुंड में देवगिरी पहाड़ पर 15 साल पहले स्वामी संतोषानंद महाराज ने पहाड़ बचाने के लिए संकीर्तन की शुरुआत की थी। दरअसल, यहां के पहाड़ अवैध खनन की भेंट चढ़ गए। कभी शाहकुंड प्रखंड में प्रवेश करते ही सिर्फ पहाड़ ही पहाड़ नजर आते थे। एक के बाद दूसरे पहाड़… लेकिन अब एक-दो पहाड़ ही नजर आते हैं।

नेपाल से आए स्वामी संतोषानंद महाराज पहाड़ की इस दुर्दशा से परेशान थे। उन्होंने यहां के पहाड़ों को बचाने के लिए 108 साल तक के लिए अखंड ओम नमः शिवाय संकीर्तन करने का संकल्प लिया। ये बात 2010 की है। 27 मई  2010 को शुरू हुए इस संकीर्तन को अब तो करीब 15 साल हो रहे हैं। उन्होंने जसीडीह के पागल बाबा आश्रम में 108 वर्ष के संकीर्तन से प्रेरित होकर यहां संकीर्तन शुरू करने की पहल की।

सीमित संसाधनों में पहले सिर्फ 5 लोगों के सहयोग से संकलित अनुष्ठान की शुरुआत की गई। अभी 20 लोग स्थाई रूप से इसमें जुटे हैं। इसके लिए तीन-तीन घंटे की पाली तय की गई है। अब आसपास के इलाकों के कई लोग केंद्र से जुड़ने लगे हैं। वे भी संकीर्तन और केन्द्र में सहयोग कर रहे हैं।

इन पहाड़ों पर कई मंदिर, एक तो पुरातत्व विभाग से संरक्षित

देवगिरि पहाड़ी अपनी विशेष भौगोलिक संरचना के कारण लोगों को आकर्षित कर रही है। सड़क तल से करीब 30 फीट ऊंची पहाड़ी के शिखर पर एक ओर संकीर्तन की कर्मशाला है। वहीं दूसरी ओर मां काली का मंदिर है। वहां से सीधे उत्तर की दिशा में सड़क की दूसरी ओर कुछ दूरी पर मां बागेश्वरी मंदिर, दुर्गा मंदिर, उसके आगे उसी दिशा में पहाड़ी की चोटी पर बाबा गिरिवरनाथ का मंदिर है। इसे पुरातात्विक विभाग ने संरक्षित कर रखा है।

अध्यात्म और ध्यान केंद्र के रूप में विकसित हो रही पहाड़ी

केंद्र के संचालक स्वामी संतोषानंद महाराज ने बताया कि पहाड़ को बचाकर ही पर्यावरण को बचाया जा सकता है। इसलिए इसके संरक्षण की पहल की जा रही है। साथ ही, प्रखंड के जगरिया की देवगिरी पहाड़ी को अध्यात्म और ध्यान केंद्र के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। केंद्र का मकसद असहायों को सहयोग करना है। इस केंद्र के खुलने से पहाड़ियों पर अवैध खनन भी बंद हो गया है।

आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों का हॉस्टल भी बना

औषधीय पौधों के संग्रह के रूप में विकसित होने से पर्यावरण को भी लाभ मिल रहा है। केंद्र में योग प्रशिक्षण, जड़ी-बूटियों से लोगों के उपचार के साथ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी शरण दिया गया है। पशु चिकित्सक निर्मल कुमार आश्रम में रह रहे बच्चों को खाली समय में पढ़ाते हैं। ब्रह्मचारी सोमानंद, ओम दीदी, शिव प्रेम, बबीता, मनोज यादव लोगों की निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

मरीजों के इलाज के लिए दुर्लभ औषधीय पौधे लगाए गए

देवगिरी पहाड़ी अध्यात्म के साथ दुर्लभ औषधीय पौधों के संग्रह के रूप में भी विकसित हो रही है। कई एकड़ में फैले इस पहाड़ी पर स्वामी महाराज, पर्यावरण प्रेमी शिरोमणि व अन्य लोगों के सहयोग से यहां रुद्राक्ष, कपूर, लौंग, हींग, सिंदूर, गुगुल, कचनार, सुरंजन, बच, दालचीनी, शिवलिंगी, सर्पगंधा, दंतकांती, ब्रह्मी, वासुमति के पौधे आकर्षण के केंद्र हैं। वहीं, देव वृक्ष पीपल, बरगद, बेल, हरसिंगार, मौलश्री, बेल, बिना कांटे वाले बेल समेत सैकड़ों प्रकार के पौधे पर्यावरण व आमजन को लाभान्वित कर रहे हैं। इनके औषधीय गुणों से लोगों का उपचार भी किया जा रहा है।

22 वर्ष की उम्र में अध्यात्म से जुड़े स्वामी संतोष

संतोषानंद जी का जन्म झारखंड के पतरातू में हुआ है। ये ब्रह्मलीन स्वामी शिवानंद तीर्थ के शिष्य हैं। 22 वर्ष की उम्र में घर त्याग कर अध्यात्म से जुड़े हैं। ये छह वर्ष बद्रीनाथ के समीप हिमालय की तराई में रहे। उसके बाद धनबाद, फिर नेपाल, जेठौरनाथ में रहे। उसके बाद 2010 से शाहकुंड के जगरिया देवगिरी पहाड़ी पर अनुष्ठान प्रारंभ किया गया।