How a Jain Nun Revived 500-Year-Old Temples in Ahmedabad’s Polsजब एक जैन साध्वी ने ठान लिया तो खंडहर आबाद होने लगे...

अहमदाबाद। कहानी गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद की है। पुराने अहमदाबाद की पोलों में 500 साल से भी पुराने 121 भव्य जिनालय हुआ करते थे। आधुनिक सुख-सुविधाओं के लिए स्थानीय लोग पलायन कर गए। नतीजतन पोलों में विरानी छा गई और पूरा इलाका खंडहर बनने लगा। लेकिन एक साध्वी ने जब इसकी ये हालत देखी और लोगों के पलायन कर जाने से इलाके में मौजूद 121 भव्य जिनालयों यानी जैन मंदिरों को भी खंडहर बनते देखा तो कसम खा ली इसे दोबारा बसाएंगी। पोलों को दोबारा बसाकर जैन मंदिरों को बचाने की मुहिम चलाने वाली हैं साध्वी श्री मैत्रीरत्नाश्रीजी म.सा.। वे अहमदाबाद के प.पू. आ.दे. श्री भक्तिसूरीश्वरजी महाराज की समुदाय से हैं। अब यहीं साध्वीजी ने ‘जिनाज्ञा आवास योजना’ की शुरुआत की है। पोलों को दोबारा आबाद करने की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनिए…

लोगों को महंगे किराए से मुक्ति और जिनालयों रखरखाव मिला

यह योजना तो बिना सिर-पैर की है… पोलों में कौन रहने आएगा… यहां फिर जैनों को बसाना संभव नहीं है… जो किसी ने नहीं किया, वह काम आप क्यों कर रही हैं… साध्वी को तो केवल भक्ति करनी चाहिए…… जब मैंने जिनालयों की देखभाल के लिए जैन परिवारों को दोबारा पोलों में बसाने का विचार रखा, तब ऐसी ही प्रतिक्रिया मिली। दिसंबर 2012 में मैं झवेरीवाड़ की चौमुखजी की पोल में आई। यहां के भव्य जिनालय देखकर में चकित रह गई और दुखी भी क्योंकि 500 साल से ज्यादा प्राचीन प्रतिमाएं, भवन, देरासर (जैन मंदिर) सब खंडहर बन रहे थे। सबसे पहले हमने सर्वे किया तो पता चला कि सिर्फ 2 से ढाई वर्ग किलोमीटर में 121 जिनालय हैं। इन्हें संजोकर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए जैन परिवारों को दोबारा यहां बसाने का विचार किया। इसके लिए हमने किराए पर रह रहे जैन परिवारों को यहां बसाने की योजना बनाई ताकि उन्हें महंगे किराए से मुक्ति मिले और जिनालयों की देखभाल हो सके। इसके लिए जरूरी था कि यहां की इमारतों की मरम्मत कराई जाए। इसके लिए धन की आवश्यकता थी। इसलिए 18 अप्रैल 2013 को ‘जिनाज्ञा युवा ट्रस्ट’ की स्थापना की गई।

दान मांगा तो उपदेश मिले: साध्वी श्री मैत्रीरत्नाश्रीजी म.सा.

दान के नाम पर उपदेश मिले। 2018 तक जो कुछ धन इकट्ठा हुआ, उससे 2018 में दोशीवाड़ा की पोल, सिमंधर स्वामी की खड़की में तीन बंद मकान खरीदे गए। उनका नवीनीकरण कर जैनियों को किराए पर दिया गया। 10 मकान किराए पर दिए जा चुके हैं। 1 कमरा-रसोई और 2 कमरे-रसोई वाले मकानों का किराया मात्र 1500 से 3500 रुपए है। किराए को मालिकों के पास ट्रांसफर करने के बाद ट्रस्ट के पास 200-250 रुपए बचते हैं। दान के लिए ‘हम राजनगर की पोलें’ नाटक का मंचन भी करते हैं।

बदलाव की शुरुआत है, मंजिल अभी बाकी है

वर्तमान में ट्रस्ट के पास कुल 40 मकान हैं, जिनमें से 30 का नवीनीकरण शेष है। पर्याप्त धन की कमी आज भी एक बड़ी चुनौती है। इन 30 में से काका बलिया की पोल और मांडवी की पोल के 5 मकानों को तोड़कर फ्लैट जैसे नए घर बनाए गए हैं, जिन्हें जनवरी में साधर्मिकों को किराये पर दिया जाएगा।

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