देवरिया। हर सनातनी के लिए अयोध्या और सरयू का अर्थ ही राम है। हिंदू धर्म ग्रंथों, वेदों और शास्त्रों में भी उल्लेख है कि अयोध्या प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि है। श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास उतना पुराना है जब मुगलों का नामों निशान भी भारत में नहीं था। श्रीराम जन्मभूमि विवाद के साथ ही शुरू हुआ आराध्य की जन्मभूमि के लिए संघर्ष। यह संघर्ष कुछ दशकों का नहीं बल्की सदियों का है। आइए शुरू से शुरू करते हैं और जानते हैं 500 वर्षों का संघर्ष और राम लला की प्राण प्रतिष्ठा की पूरी कहानी।

1528 से हुई इस कहानी की शुरुआत
इस पूरी कहानी या संघर्ष की शुरुआत 1528 से हुई, जब बाबर ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और देश में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी। इतिहास में किए गए उल्लेख के अनुसार बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के आदेश पर अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त करके वहां मस्जिद का निर्माण करवाया। मीर बाकी ने बाबर के नाम से ही उसे बाबरी मस्जिद नाम दिया। हालांकी किसी भी मुगल या हिंदी ऐतिहासिक लेख में किसी ने बाबरी मस्जिद के 1528 में बनने का उल्लेख नहीं किया है।


साल1853 में पहली बार राम मंदिर को लेकर अयोध्या में दंगा हुआ। इसके बाद 1857 में हनुमानगढ़ी के महंत ने मस्जिद के आंगन के पूर्वी हिस्से में एक चबूतरा बनाया। जिसे राम चबूतरा और राम जन्मभूमि कहा गया। विवाद बढ़ने पर यह मामला कोर्ट पहुंचा। मौलवी मोहम्मद असगर ने जिला मिजिस्ट्रेट के सामने अर्जी लगाई। 1859 में मिजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि मस्जिद में एक दीवार खड़ी की जाए, अंदर के हिस्से में मुस्लिम समुदाय इबादत करेगा और बाहरी हिस्से में हिंदू पक्ष को पूजा-पाठ का अधिकार होगा।

1851 में निर्मोही अखाड़ा ने डाली एक और अर्जी
साल 1851 में निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुवार दास ने राम चबूतरे का कानूनी हक लेने के लिए कोर्ट में अर्जी डाली। अपनी इस अर्जी में पहली बार उन्होंने इस जगह पर मंदिर बनाने की मांग की। कोर्ट में लंबी चली सुनवाई के बाद 1886 में इस याचिका को खारिज कर दिया गया। इसके बाद इतिहासकारों के अनुसार अयोध्या में कई बार सांप्रदायिक दंगे हुए।

1934 में हुए दंगों में मस्जिद का हिस्सा गिराया गया
साल 1886 से लेकर 1934 तक राम मंदिर को लेकर संघर्ष चलता रहा। इस दौरान कई दंगे हुए कई बार हिंसा भड़की जिसमें लोगों ने अपनी जान गंवाई। 1934 में फिर दंगे हुए जिसमें लोगों ने बाबरी मस्जिद के कुछ हिस्से को ढहा दिया। इसके बाद मस्जिद के टूटे हुए हिस्से को अंग्रेजों ने ठीक कराया। 1936 में सिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच मस्जिद के अधिकार को लेकर विवाद शुरू हुआ। जो लगभग 10 सालों तक चला। अंत में साल 1944 में वक्फ बोर्ड ने मस्जिद को सुन्नी प्रॉपर्टी घोषित कर दिया क्योंकि, क्योंकि बाबर सुन्नी मुसलमान था।

1947 में आजादी के बाद तेज हुई मंदिर की मांग
साल 1947 में देश आजाद हुआ। दिसंबर 1949 में अयोध्या में 9 दिनों के रामचरितमानस पाठ का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजय नाथ भी शामिल हुए। 22 और 23 दिसंबर की रात मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां मिलने की बात कही गई। हिंदुओं ने कहा भगवान राम स्वयं प्रकट हुए हैं। मुस्लिम पक्ष ने आरोप लगाया कि किसी ने चोरी छिपे मस्जिद में भगवान की मूर्ति रखवाई है। हिंदू पक्ष ने 23 दिसंबर की सुबह मस्जिद में ही रामलला की पूजा शुरू कर दी।

जब जिलाधिकारी ने नेहरू के मूर्ति हटाने के आदेश को नहीं माना था

हिंदुयों द्वारा मस्जिद में राम लला की पूजा करने पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बयान दिया और कहा था कि- “जो हुआ वह गलत हुआ किसी भी धार्मिक स्थान को कोई हथिया नहीं सकता।” इस दौरान का एक किस्सा बहुत मशहूर हुआ था। दरअसल जवाहर लाल नेहरू ने उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी केके नायर को खत लिखकर मस्जिद से मूर्ति हटाने और पहले जैसी यथास्थिति बनाने का आदेश दिया। खत के जवाब में नायर ने सुझाव दिया कि- “इस मामले को अदालत को दे दिया जाए। जब तक अदालत का फैसला नहीं आता तब तक मस्जिद में रखी गई मूर्ति के पास वहां एक जालीनुमा गेट लगा दिया जाए। नेहरू ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया।

1949 में बाबरी मस्जिद को विवादित ढांचा घोषित किया गया
इस वाकये के बाद यह विवाद कोर्ट पहुंचा और सुनवाई के बाद 29 दिसंबर 1949 को कोर्ट ने पहली बार बाबरी मस्जिद को विवादित स्थल घोषित किया और बाबरी मस्जिद के लिए विवादित ढांचा जैसे शब्दों का प्रयोग होने लगा। कोर्ट के आदेश के बाद मस्जिद के बाहर ताला लग गया।

अब शुरू हुआ राम जन्मभूमि पर हक का मामला
1950 में गोपाल सिंह विशारद ने सिविल केस फाइल किया और कोर्ट से हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति मांगी। साथ ही मूर्तियों को उस जगह से न हटाने की अपील की। कोर्ट ने विशारद की यह इस अपील खारिज कर दी। इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़े ने एक बार फिर कोर्ट में याचिका दायर की और राम चबूतरे के साथ पूरे 2.77 एकड़ जमीन पर राम मंदिर का हक मांगा। इसके दो साल बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी कोर्ट में केस दायर किया। वक्फ ने मुस्लिमों का पक्ष रखते हुए केस फाइल किया और कहा कि यहां पहले मस्जिद थी और अब भी मस्जिद है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलील देते रहे और केस सालों कोर्ट में चलता रहा।

1980 से उठी राम मंदिर बनाए जाने की मांग

1980 में भाजपा ने जनसंघ से अलग होने के बाद हिंदू संगठनों और राममंदिर का पूरा समर्थन किया। अब मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाए जाने की मांग जोर पकड़ते जा रही थी। 1984 में धर्म संसद का दिल्ली में आयोजन किया गया जिसमें विश्व हिंदू परिषद नेता अशोक सिंघल ने रथयात्रा निकालने का प्रस्ताव रखा लेकिन इसके 6 महीने बाद ही इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के कारण रथयात्रा को स्थगित कर दिया गया।

1986 में कोर्ट ने मस्जिद के ताले खोलने के आदेश दिए

इंदिरा गांधी के बाद जब राजीव गांधी ने सत्ता संभाली तब उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह पर दबाव डाला कि बाबरी मस्जिद के ताले को खोल दिया जाए। इसके कुछ ही दिन बाद 1986 में फैजाबाद की अदालत ने बाबरी मस्जिद के ताले को खोलने का आदेश दिया और मंदिर में पूजा करने की भी इजाजत दे दी।इससे पहले कोर्ट द्वारा नियुक्त एक पुजारी के द्वारा साल में केवल एक बार पूजा होती थी। पूजा तो शुरु हो गई थी लेकिन नमाज नहीं पढ़ी जा रही थी। ताला खुलने के बाद मुस्लिम पक्ष ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाई।

9 नवंबर 1989 को रखी गई राम मंदिर की नींव

अब राम मंदिर बनने का दबाव बढ़ रहा था। इस बीच कई जगहों पर सांप्रादायिक दंगे हुए जिसमें बहुत से लोग मारे गए। 9 नवंबर को विहिप ने विवादित स्थल के पास राम मंदिर की नींव रख दी और मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज कर दिया।1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 85 सीटें मिली। भाजपा ने वीपी सिंह को समर्थन दिया। वीपी सिंह प्रधानमंत्री मंत्री बने। इसके बाद 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकालने की घोषणा कर दी।

रथयात्रा रोकने पर भाजपा ने वापस लिया समर्थन
रथयात्रा 25 सितंबर को निकली और 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था। 23 अक्टूबर को बिहार के समस्तिपुर में रथयात्रा को वीपी सिंह के आदेश पर रुकवा दिया गया और लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना की खबर दिल्ली पहुंचते ही अटल बिहारी वाजपेयी ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस खींच लिया और केंद्र की वीपी सिंह की सरकार गिर गई। 30 अक्टूबर रथ यात्रा के अयोध्या पहुंचने का तय समय था इस वजह कड़े प्रतिबंध के बाद भी पूरे देश से बड़ी संख्या में कार सेवक अयोध्या पहुंचने लगे थे। इस दौरान कई जगहों पर दंगे हुए और लोग मारे गए।


30 अक्टूबर 1990 तक देशभर से भारी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचते हैं। इस दिन अयोध्या में कर्फ्यू लागू था। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद कारसेवकों की भारी भीड़ वहां इकट्ठा होती है। इन सबके बीच कोलकाता से पहुंचे कोठारी बंधु, शरद कोठारी और राम कोठारी ने मस्जिद की गुंबद पर चढ़कर भगवा ध्वज फहराया। हालात गंभीर होते जा रहे थे। उधर तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। पूरी अयोध्या कार सेवकों के रक्त से लाल हो गई थी। जो पुलिस की गोलियों से बचे वो भगदड़ में मारे गए। 2 नवंबर को फिर कारसेवकों पर फायरिंग हुई जिसमें कोठारी बंधुओं समेत 28 कार सेवकों की मौत हो गई।

1991 के बाद क्या हुआ?

1991 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस और यूपी में भाजपा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। सरकार बनते ही विवादित स्थल के पास की जमीन पर कई मंदिर और आश्रम थे। उनके महंतों ने सहमति से राम जन्मभूमि न्यास को अपनी भूमि दान की और कहा कि राम मंदिर का निर्माण हो सके, इसलिए यह दान दिया जा रहा है। न्यास ने निर्माण कार्य भी शुरु कर दिया था लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी।

वीएचपी ने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवक दिवस मनाने का ऐलान किया। जिसके लिए लगभग 2 लाख कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे। ये सभी कारसेवक एक साथ मस्जिद की तरफ बढ़े और मस्जिद को गिरा दिया। इसके बाद वहां रामलला के लिए एक छोटा सा मंदिर तैयार किया गया और राम लला का स्थापित किया गया। 6 दिसंबर की शाम 6 बजे तक यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपना इस्तीफा दे दिया।

2002 के गोधरा कांड में मारे गए कई कारसेवक
2002 में यूपी चुनाव में जारी किए गए भाजपा के घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा शामिल नहीं किया गया था। जिसके बाद वीएचपी ने कारसेवकों को फिर अयोध्या में जुटने का आह्वान किया। अयोध्या से जब कार सेवक लौट रहे थे तो गोधरा की एक ट्रेन में आग लगा दी गई थी जिसमें बहुत से कारसेवक और दूसरे यात्रियों की जलकर मौत हो गई थी। जिसके बाद गुजरात में भीषण दंगे फैल गए। इसकी आंच पूरे देश में फैल गई और दूसरे राज्यों में भी माहौल खराब हुए।

2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में शुरु हुई सुनावई
इस पूरी घटना के बाद कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और अप्रैल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच विवादित स्थल के मालिकाना हक की कार्रवाई शुरू की। कोर्ट ने मस्जिद के एएसआई सर्वे का काम सौंपा। एएसआई ने विवादित स्थान पर 6 महीने तक खुदाई कर सर्वे किया और अगस्त 2003 में अपनी रिपोर्ट पेश की।

एएसआई के रिपोर्ट में क्या था
एएसआई के किए गए सर्वे की रिपोर्ट आ चुकी थी जिसपर सभी की निगाहें टिकी हुई थी। बाबरी की खुदाई में कई तथ्य सामने आए जो इस बात पर जोर देती थी कि यहां पहले मंदिर ही था। रिपोर्ट में बताया गया कि खुदाई में 10-12 सेंचुरी के बीच के हिंदू मंदिरों के अवशेष जैसे पिलर, ईंटे, शिलालेख और अन्य चीजें मिली हैं। पहली बार विवादित स्थल से जुड़े वैज्ञानिक सबूत भी मिलते हैं। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा, एक तिहाई हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास और बाकी एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इस फैसले से तीनों ही पक्ष नाखुश थे।

निर्मोही अखाड़ा, जन्मभूमि न्यास और वक्फ बोर्ड फिर गए कोर्ट

साल 2011 में फिर निर्मोही अखाड़ा, राम जन्मभूमि न्यास और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जनवरी 2019 में अयोध्या केस की सुनवाई के लिए 5 चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस बोबड़े और जस्टिस एनवी रमन्ना की पीठ गठित की गई। इस बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

9 नवंबर 2019 को आया ऐतिहासिक फैसला
9 नवंबर 2019 को इस बेंच ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसने सदियों से चले आ रहे इस संघर्ष का अंत कर दिया। बेंच ने सर्वसम्मति से फैसला लिया और एएसआई की साइंटिफिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए 2.77 एकड़ की पूरी जमीन जो विवादित थी, वह रामलला विराजमान को दे दी गई। साथ ही सरकार को आदेश दिया गया कि राममंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाई जाए। इधर सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का भी आदेश दिया गया।

5 अगस्त 2020 को नरेंद्र मोदी ने पूरा किया अपना संकल्प

5 फरवरी 2020 को रामजन्मभूमि ट्रस्ट को मंजूरी मिली। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या पहुंच कर रामजन्मभूमि का पूजन और शिलान्यास किया। जब 1992 में रथ यात्रा के दौरान एक साधारण कार्कर्ता के रूप में पीएम मोदी आडवाणी जी के साथ अयोध्या आए थे और उन्हें पूछा गया था कि अब वो दोबारा अयोध्या कब आएंगे तब उन्होंने कहा था कि जब राम मंदिर बनेगा तब आएंगे, और उन्होंने वही किया। तब कोई नहीं जानता था कि नरेंद्र मोदी कौन है। 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने से करोड़ों सनातनियों का सदियों का सपना, लाखों कारसेवकों की कुर्बानियां सफल हो गईं। सालों टेंट में फिर फाइबर के मंदिर में विराजित राजा राम को उनका महल मिल ही गया।