देवरिया। अगर आप पॉडकास्ट को समझना चाहते हैं, तो याद करिए वो जमाना जब आप रेडियो पर मनचाहे गीत के लिए उन कार्यक्रमों का इंतजार करते थे, जिनमें आपकी फरमाइशें पूरी होती थीं। सुबह रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर रात के ‘छायागीत’ तक का वक्त हमें रटा होता था। अब वही रेडियो आपके फोन पर बस एक क्लिक दूर है। बस इंटरनेट की जरूरत है और आपकी ‘Playable on Demand’ (POD) ब्रॉडकास्टिंग शुरू!
क्या है पॉडकास्ट?
पॉडकास्ट असल में ‘Internet Radio’ है। यह ऑडियो फाइल्स की एक सीरीज है, जिसे आप जब चाहें, जहां चाहें सुन सकते हैं। यूरोपियन देशों में इसकी लोकप्रियता काफी पहले से थी, लेकिन भारत में अब यह ‘Digital Renaissance’ (पुनर्जागरण) का हिस्सा बन चुका है। अब ‘Videocast’ का चलन भी बढ़ गया है, जहाँ आवाज के साथ-साथ आप प्रेजेंटर को देख भी सकते हैं।
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पॉडकास्ट सुनने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश
भारत में पॉडकास्ट के बढ़ते कद को इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:
तीसरा सबसे बड़ा बाजार: PwC की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पॉडकास्ट सुनने वाला देश बन चुका है।
यूजर्स की संख्या: आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, भारत में पॉडकास्ट सुनने वालों की संख्या साल-दर-साल 30% की दर से बढ़ रही है। 2026 तक भारत में लगभग 15 से 20 करोड़ सक्रिय पॉडकास्ट श्रोता होने की संभावना है। दूसरे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से तुलना की जाए तो यह संख्या कम लग सकती है, लेकिन दुनिया के स्तर पर देखें तो यह संख्या कई बड़े देशों की जनसंख्या से भी कहीं बहुत ज्यादा है।
स्थानीय भाषा का जादू: केवल अंग्रेजी ही नहीं, बल्कि हिंदी, तमिल, बंगाली और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट की मांग सबसे अधिक है। अब कई कंटेंट क्रिएटर मैथिली, भोजपुरी जैसी स्थानीय बोलियों में भी कंटेंट तैयार कर रहे हैं। इससे podcast का बाजार तेजी से बढ़ा है।
मल्टी-टास्किंग का बेहतरीन साथी है पॉडकास्ट
आज के दौर में जब समय की कीमत बहुत ज़्यादा है, पॉडकास्ट एक वरदान की तरह है। क्योंकि इसके साथ कोई भी काम रोकना नहीं पड़ता। किचन में खाना बनाते हुए, ऑफिस की फाइल्स समेटते हुए, पौधों को पानी डालते हुए या माँ-पिता के पैर दबाते हुए… खबरों और विचारों (News and Views) से वाकिफ हो सकते हैं। यह ‘आई-लेस’ (Eye-less) मनोरंजन है, जिसके लिए आपको स्क्रीन पर नज़रें गड़ाने की ज़रूरत नहीं होती।
क्यों पॉडकास्ट बन रहा है इंडिया का नया रेडियो?
किफायती डेटा: ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान और सस्ते डेटा की उपलब्धता ने इसे जन-जन तक पहुँचाया है।
समय की बचत: लोग ट्रैवल करते समय या बोरियत के पलों में कुछ नया सीखना पसंद करते हैं।
विविधता: यहाँ अपराध (True Crime), अध्यात्म, बिजनेस और कहानियों (Storytelling) का असीमित खजाना है।
मुफ्त उपलब्धता: अधिकांश प्लेटफॉर्म जैसे Spotify, YouTube, और JioSaavn पर यह कंटेंट मुफ्त में उपलब्ध है।
सुनकर सीखने की परंपरा वाले देश में Podcast का भविष्य
भारत वैसे भी रेडियो प्रेमियों और ‘श्रुति’ (सुनकर सीखने) की परंपरा वाला देश है। बढ़िया कंटेंट और इंटरनेट कनेक्टिविटी पॉडकास्ट को और भी अधिक लोगों से जोड़ रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि जो जगह कभी ट्रांजिस्टर ने ली थी, अब वह जगह पॉडकास्ट ले चुका है।
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100 साल से ज्यादा का हो गया भारत का रेडियो
भारत का रेडियो 100 साल से ज्यादा का हो गया है। देश में रेडियो की शुरुआत जून 1923 में हुई। बॉम्बे के ‘रेडियो क्लब’ ने देश का पहला कार्यक्रम प्रसारित किया था। इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (IBC) ने 1927 में बॉम्बे और कलकत्ता में दो निजी रेडियो स्टेशनों की स्थापना की। हालांकि, आर्थिक कारणों से यह कंपनी 1930 में बंद हो गई।
ऑल इंडिया रेडियो का जन्म (1930 – 1947)
- सरकारी नियंत्रण: 1930 में सरकार ने इन स्टेशनों को अपने हाथ में ले लिया और ‘भारतीय राज्य प्रसारण सेवा’ (ISBS) की शुरुआत की।
- AIR का नामकरण: 8 जून 1936 को इसका नाम बदलकर ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) कर दिया गया।
- आकाशवाणी: 1957 में ऑल इंडिया रेडियो को आधिकारिक तौर पर ‘आकाशवाणी’ कहा जाने लगा। यह नाम प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने सुझाया था।
आज़ादी की लड़ाई और रेडियो
- कांग्रेस रेडियो: 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उषा मेहता ने एक गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया था, जिसे ‘कांग्रेस रेडियो’ कहा जाता था। इसके जरिए क्रांतिकारियों तक खबरें पहुँचाई जाती थीं।
- आज़ाद हिंद रेडियो: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी से रेडियो के माध्यम से भारतीयों को संबोधित किया और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा दिया।
विविध भारती और मनोरंजन का स्वर्ण युग (1957 – 1990)
- विविध भारती की शुरुआत: 3 अक्टूबर 1957 को आकाशवाणी की लोकप्रिय सेवा ‘विविध भारती’ शुरू हुई। इसने फिल्मी गानों, नाटकों और ‘बिनाका गीतमाला’ जैसे कार्यक्रमों से घर-घर में अपनी जगह बना ली।
- रेडियो का प्रभाव: उस दौर में रेडियो समाचार जानने और क्रिकेट कमेंट्री सुनने का सबसे विश्वसनीय माध्यम था।
5. निजी एफएम (FM) की क्रांति (1993 – वर्तमान)
- FM का आगमन: 1993 में सरकार ने निजी ऑपरेटरों को रेडियो के क्षेत्र में आने की अनुमति दी। इससे ‘रेडियो मिर्ची’, ‘रेडियो सिटी’ और ‘रेड एफएम’ जैसे चैनलों की बाढ़ आ गई।
- कम्युनिटी रेडियो: स्थानीय स्तर पर सूचनाएँ पहुँचाने के लिए कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों की शुरुआत हुई, जो किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हुए।
6. डिजिटल युग: मन की बात और पॉडकास्ट
- मन की बात: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में ‘मन की बात’ कार्यक्रम शुरू कर रेडियो को एक बार फिर जन-संवाद का मुख्य केंद्र बना दिया।
- डिजिटल रेडियो और पॉडकास्ट: आज रेडियो ‘प्रसार भारती’ ऐप और पॉडकास्ट के माध्यम से आपके स्मार्टफोन पर उपलब्ध है। अब आप इंटरनेट के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर अपने शहर का रेडियो सुन सकते हैं।
प्रमुख रोचक तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| सिग्नेचर ट्यून | आकाशवाणी की प्रसिद्ध धुन वाल्टर कॉफ़मैन ने तैयार की थी। |
| पहला विज्ञापन | 1967 में विविध भारती पर व्यावसायिक विज्ञापन (Commercials) शुरू हुए। |
| पहुँच | आज आकाशवाणी भारत की 99% से अधिक आबादी तक पहुँचती है। |
