किसी भी देश में शिक्षा का बजट कम से कम 10% जरूर होना चाहिएकिसी भी देश में शिक्षा का बजट कम से कम 10% जरूर होना चाहिए

देवरिया/नई दिल्ली: केंद्रीय बजट 2026-27 के पेश होने के बाद शिक्षा क्षेत्र में निवेश को लेकर बहस छिड़ गई है। समान शिक्षा आंदोलन, उत्तर प्रदेश के सह-संयोजक डॉ. चतुरानन ओझा ने बजट के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार की ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था’ बनाने की बयानबाजी और वास्तविक राजकोषीय आवंटन के बीच एक बड़ी खाई है।

जीडीपी बढ़ी 9.8%, शिक्षा बजट केवल 8.3%– क्या यह विकास है?

डॉ. ओझा के अनुसार, पिछले वर्ष भारत की नाममात्र (Nominal) जीडीपी में लगभग 9.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके उलट, बजट 2026 में शिक्षा के लिए आवंटन में मात्र 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। डॉ. चतुरानन ओझा कहते हैं- “जब किसी क्षेत्र का बजट अर्थव्यवस्था की विकास दर से भी धीमी गति से बढ़ता है, तो इसका सीधा मतलब है कि उसे राष्ट्रीय संसाधनों का घटता हुआ हिस्सा मिल रहा है।”

आंकड़ों का कड़वा सच: 0.4% पर अटका शिक्षा खर्च

विशेषज्ञों का कहना है कि नाममात्र जीडीपी के अनुपात में शिक्षा पर केंद्रीय खर्च महज 0.35–0.4 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर ही अटका हुआ है। दशकों से की जा रही ‘ऊंची बयानबाजी’ के बावजूद, शिक्षा आज भी कुल केंद्रीय बजट का केवल 2.5% हिस्सा ही प्राप्त कर पा रही है। यह आंकड़ा सरकार के उन दावों के विपरीत है जिसमें युवाओं और नवाचार को प्राथमिकता बताया जाता है।

कोठारी आयोग के 60 साल: वादे और हकीकत

ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए डॉ. ओझा ने याद दिलाया कि कोठारी आयोग (1966) ने शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने की सिफारिश की थी।
जनता की मांग: कुल बजट का 10% शिक्षा पर खर्च हो।
हकीकत: छह दशक बाद भी हिस्सेदारी बढ़ने के बजाय घट रही है।
परिणाम: नामांकन बढ़ने और बुनियादी ढांचे की जरूरतें होने के बावजूद शिक्षकों की कमी और निजीकरण का बोलबाला बढ़ रहा है।

आम शिक्षण संस्थानों की उपेक्षा

बजट में “विश्व-स्तरीय संस्थान” बनाने के बड़े वादों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। डॉ. ओझा का तर्क है कि उन आम स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है जहां देश की अधिकांश छात्र शक्ति शिक्षा ग्रहण करती है। निवेश में यह कमी धीरे-धीरे शिक्षा का बोझ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर डाल रही है।

दीर्घकालिक दुष्परिणामों की चेतावनी

समान शिक्षा आंदोलन ने चेतावनी दी है कि शिक्षा के प्रति यह ‘राजकोषीय उदासीनता’ देश के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को आपदा में बदल सकती है। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्रीय प्राथमिकता होती, तो आवंटन की गति जीडीपी की वृद्धि दर से अधिक होनी चाहिए थी।

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