calcutta high court advocate dwarkanathकलकत्ता हाईकोर्ट के वकील द्वारकानाथ चटर्जी हौसले की मिसाल बन गए हैं।

कोलकाता। सिर से लेकर कमर तक का हिस्सा 90 डिग्री नीचे झुका हुआ है। सिर नीचे झुके होने से न किसी को उनका चेहरा दिखता है और न ही उन्हें सामने से आने वाले लोग। दर्द ऐसा कि सहन करना भी मुश्किल, रोजाना 8-10 तरह की दवा लेना, पानी पीना भी आसान नहीं… झुकी अवस्था में ही स्ट्रॉ के जरिये पानी पीना या खाना… जिन्दा रहने के लिए Physiotherapy और Exercise करते रहना… काले पैंट और सफेद कमीज पहने ये शख्स एडवोकेट द्वारकानाथ चटर्जी हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट में 27 सालों से प्रैक्टिस कर रहे 53 साल के सीनियर एडवोकेट द्वारकानाथ रोजाना अपने घर हावड़ा के शिवपुर इलाके से 8-10 किलोमीटर की दूरी पब्लिक बस से डलहौजी आते हैं। कभी वे कलकत्ता हाईकोर्ट के गलियारे में दिखते है तो कभी लोकभवन (राजभवन ) के सामने रजिस्ट्री ऑफिस में… द्वारकानाथ कहते हैं- मैं रोजाना सुबह उठकर दाढ़ी बनाने से लेकर कपड़े धोने तक का सारा काम खुद ही करता हूं। घर के लिए राशन से लेकर सब्जी तक मैं ही खरीदता हूं। सोमवार से शुक्रवार तक सुबह ऑफिस टाइम पर 10 बजे घर से निकलता हूं और बस लेकर हावड़ा शिवपुर से डलहौजी आता हूं। फिर शाम को 5.30 बजे बस लेकर घर लौटता हूं। कई बार दो बार बस बदलकर भी मैं हाईकोर्ट या रजिस्ट्री ऑफिस पहुंचता हूं।

मैं भी बीमारी की दुहाई देकर घर बैठ सकता था

रास्ते में ट्रैफिक पुलिस से लेकर आम लोग जरूरत पड़ने पर मेरी मदद करते हैं। कुछ लोगों को मेरी हालत देखकर घृणा भी होती है। मैं भी चाहता तो अपनी बीमारी को लेकर घर बैठ जाता, लेकिन मैं स्वामी विवेकानंद के सिद्धांत उठो, जागो, आगे बढ़ो.. को मानता हूं और उसी पर चलता हूं। मेरा यह भी मानना है कि काम हताशा को दूर करता है। इसलिए हमें अपना काम करते रहना चाहिए। कर्म ही धर्म है। वे कहते हैं- Self Confidence is the best confidence. यही हमें हर विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने में मदद करती है। मैं Law journal का Joint Editor भी हूं। High court और Supreme court के judgement citation, headnote, footnote आदि मैं खुद ही लिखता हूं। उसमें मेरा नाम भी लिखा होता है। मैं लॉ की किताब भी लिख रहा हूं।

साल 2016 को एक दिन कोर्ट में ही गिर गया… तबसे ऐसा हो गया

द्वारकानाथ बताते हैं- मेरा जन्म 1 जनवरी 1973 को शिवपुर में हुआ है। साल 1999 से मैं कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहा हूं। 2016 के पहले तक मेरे पास क्लाइंट और पैसों की कोई कमी नहीं थी। जीवन में सब कुछ बढ़िया चल रहा था, लेकिन साल 2016 में कोर्ट में केस लड़ने के दौरान अचानक मेरे दोनों पैर आपस में जुड़ गए और मैं गिर गया। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। एक निजी अस्पताल में 6-7 लाख रुपये में ऑपरेशन कर मेरे गर्दन के पिछले हिस्से में मेटल प्लेट लगाई गई। इसके बाद जाँच में पता चला कि मुझे एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing spondylitis) बीमारी है जो HLA B27 Positive पाए जाने पर होती है। इस बीमारी में रीढ़ की हड्डी पूरी तरह झुक जाती है और लगातार दर्द होता है। मेरी पीठ पूरी तरह नीचे की ओर झुक गई है और रोजाना असहनीय दर्द होता है। सांस लेने में दिक्कत होती है। इनहेलर लेना पड़ता है। रोजाना 8-10 दवाएं खाता हूं। डॉक्टर की सलाह पर फिजियोथेरेपी व एक्सरसाइज करता हूं। ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने मुझे कहा था कि मैं कभी नहीं चल पाऊंगा। मुझे व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ेगा लेकिन मैंने व्हीलचेयर नहीं लिया।

अदम्य साहस: टैगोर के आदर्श और दर्द के बीच कर्तव्य पथ

एडवोकेट द्वारकानाथ कहते हैं- कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर का कालजयी मंत्र, “एक बार नहीं हो रहा, तो बार-बार कोशिश करो”, यही मेरे जीवन का आधार स्तंभ है। टैगोर की इसी सीख ने उनमें वह प्रेरणा भरी, जिसके बल पर वे आज शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खुद के पैरों पर खड़े हैं। द्वारकानाथ के कंधे पर अपनी वृद्ध मां, पत्नी और ग्रेजुएशन कर रहे बेटे के पालन-पोषण की बड़ी जिम्मेदारी है। उनके जीवन में संघर्ष तब और गहरा गया जब गंभीर ऑपरेशन के बाद संभलने का वक्त आया ही था कि कोरोना महामारी ने दस्तक दे दी। साल 2021 से वे निरंतर असहनीय शारीरिक दर्द से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। द्वारकानाथ का मानना है कि यदि वे दर्द के डर से घर बैठ गए, तो न केवल परिवार का चूल्हा बुझ जाएगा, बल्कि वे खुद भी हताशा और डिप्रेशन के गहरे भंवर में समा जाएंगे। उन्होंने इस पीड़ा को उपेक्षित करने के बजाय अपना ‘गले का हार’ बना लिया है।

न्याय की जंग: जज का सहयोग और साथियों का अटूट भरोसा

शारीरिक सीमाओं के कारण द्वारकानाथ के पास आने वाले क्लाइंट्स की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है, लेकिन उनके काम की गुणवत्ता आज भी बेजोड़ है। फोन और व्हाट्सएप के माध्यम से जब नए क्लाइंट उनसे संपर्क करते हैं, तो पहली मुलाकात में द्वारकानाथ की शारीरिक स्थिति देखकर अक्सर वे निराश हो जाते हैं। हालांकि, जैसे ही द्वारकानाथ अपनी योग्यता, वर्षों के अनुभव और आत्मविश्वास के साथ तर्क पेश करते हैं, क्लाइंट का संदेह गहरे भरोसे में बदल जाता है। द्वारकानाथ का स्पष्ट मानना है कि अदालत में केवल न्याय की जीत होती है। वहां वकील का हुलिया नहीं बल्कि उसकी दलीलें और कानून की समझ मायने रखती है। उनके इस जज्बे को न केवल उनके सहकर्मी और जूनियर एडवोकेट सराहते हैं, बल्कि वे क्लाइंट्स दिलाने में भी उनकी सक्रिय मदद करते हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट से लेकर अलीपुर और बैंकशाल कोर्ट तक, द्वारकानाथ कागजी कार्रवाई, ड्राफ्टिंग और जिरह का सारा काम खुद संभालते हैं। सुनवाई के दौरान जज उन्हें विशेष अनुमति देते हैं ताकि वे कुर्सी पर बैठकर माइक्रोफोन की मदद से अपना केस लड़ सकें।

राजनीतिक विजन: संसद में पीड़ितों की आवाज बनने का सपना

द्वारकानाथ की स्वाभिमानी शख्सियत ऐसी है कि वे कभी किसी से आर्थिक मदद नहीं मांगते, बल्कि उनके मित्र और वरिष्ठ वकील उनके समर्पण को देखकर खुद उनकी सहायता के लिए आगे आते हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट के गलियारों में उन्हें संघर्ष करते देख वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि द्वारकानाथ को देखकर उन्हें अपनी खुद की परेशानियां बहुत छोटी लगने लगती हैं। वे एक सच्चे कर्मयोगी हैं और चाहते हैं कि सरकार भी ऐसे परिश्रमी व्यक्तियों की सुध ले। हालांकि, द्वारकानाथ का सपना व्यक्तिगत मदद से कहीं आगे का है; वे सक्रिय राजनीति में उतरकर चुनाव लड़ना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि वे संसद तक पहुँचकर दिव्यांगों, वंचितों और गरीबों की वह बुलंद आवाज बनें, जो अक्सर अनसुनी रह जाती है। वे कहते हैं कि यदि कोई भी राजनीतिक पार्टी उन्हें सम्मान के साथ अवसर देगी, तो वे इसे एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार करेंगे। उनका लक्ष्य केवल केस जीतना नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों के जीवन में उम्मीद की रोशनी भरना है जो अपनी अक्षमता से हार मान चुके हैं।

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