देवरिया। बिहार में “सतुआनी” का त्योहार है और ‘जुड़-शीतल’ नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है।। रबी फसलों की कटाई के वक्त सतुआनी का ये त्यौहार बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है, वहीं और कई क्षेत्रों में इसी समय में मनाए जाने वाले त्योहारों को अलग अलग नामों से जाना जाता है। हर वर्ष जुड़ शीतल के एक दिन पूर्व सतुआनी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन जौ और नई फसलों को कूट पीस कर घर में हीं सत्तु तैयार किया जाता है और कुलदेवी/कुलदेवता पर इस सत्तु को गुड़, आम के टिकोरे के साथ चढ़ाया जाता है। इसके पीछे की वजह है नई फसलों को सर्वप्रथम देवी/देवता को समर्पित करना। जुड़ शीतल का खाना इसी दिन बना कर रख लिया जाता है। सूर्य का मीन राशि को छोड़ प्रथम राशि मेष में प्रवेश करने की वजह से इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं।
समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं श्रेत्रीय त्योहार
‘जुड़-शीतल’- आखिर हमारी संस्कृति में इतने त्यौहार और इतनी परम्पराएं क्यों हैं? ये सवाल अक्सर किया जाता रहा है, खासकर युवा पीढ़ी के द्वारा। परम्पराओं और रीति रिवाजों पर गौर करें तो मालूम पड़ता है कि हमारी भारतीय संस्कृति में मनाये जाने वाले त्योहार केवल हमारी खुशियों को व्यक्त करने का साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन, हमारे पर्यावरण और समाज को और बेहतर बनाए जाने की एक प्रक्रिया है। बात चाहे क्षेत्रीय त्योहारों की हो अथवा राष्ट्रीय, हमारे त्योहारों को मनाये जाने के पीछे ऐसे कई उद्देश्य समाहित होते हैं जो बड़ी गहराई से हमारे समाज, हमारे पर्यावरण और हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।
पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है ये त्योहार
मिथिलांचल का ये नव वर्ष पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ की दृष्टी से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इस दिन हम जल्दी उठने की कोशिश करते हैं; ऐसा इसलिए कि आज के दिन घर के बुजुर्ग देवता के पास रखे जल को चुल्लू में भर कर हमारे सर पर डालतीं थीं और आशीष देते हुए कहती थीं- “जुड़ायल रह”, यानी जुड़े रहो, फलो फूलो, संतुष्ट रहो।
नव वर्ष पर खाया जाता है बासी खाना
इस समय से ग्रीष्म ऋतु का यौवन प्रारम्भ होता है और देवता-घर में घड़े में रखे बासी जल को प्रतीकात्मक तौर पर सर पर इसलिए डाला जाता है ताकि पूरी गर्मी हमारा मस्तिष्क ठण्डा रहे और लू से हमारी रक्षा हो। सच कहूँ तो माथे पर रखे उस चुल्लू भर जल से वाकई ऐसे ठण्डक मिलती थी कि बहुत देर तक लगता था मानो किसी ने सूखी बंजर मिट्टी में पानी डाल दिया हो। नव वर्ष के दिन मिथिला में बासी खाना खाने की परम्परा रही है।
एक दिन पहले बना लिए जाते हैं व्यंजन
कई प्रकार के व्यंजन एक दिन पूर्व हीं बनाए जाते है; जिसमें कढ़ी चावल, दाल की पूरी, सहजन की सब्जी आदि प्रमुख है। बासी खाना खाने के पीछे का कारण यह है कि ऐसा माना जाता है कि इस दिन से ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत हो जाती है और बासी खाना पेट को ठण्डक पहुंचाता है और सहजन (drumstick) के सेवन से ‘जॉण्डीस’ और ‘चीकन पॉक्स’ से हमारी रक्षा होती है, तो दूसरी तरफ आम की चटनी लू से हमारी रक्षा करती है। जुड़-शीतल के दिन पेड़ों में पानी डाला जाता है और नये पौधे लगाए जाते हैं।
गीली मिट्टी खेलने की भी है परंपरा
मुझे याद है कि इस दिन हम दादाजी के साथ बाग में जाते थे। दादाजी ने अनगिनत पौधे लगाए थे। हम हर पेड़-पौधे में पानी डालते थे साथ ही कहते जाते थे जुड़ायल रह, जुड़ावइत रहा। इस दिन मिट्टी के घड़े भी दान किये जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में गीली मिट्टी की होली खेली जाती है। आपने ‘MUD SPA’ और ‘MUD BATH’ का नाम तो अवश्य सुना होगा या वहाँ गये होंगे; जो महंगे दामों में उप्लब्ध है लोग बड़े शौक से पैसे खर्च कर यहाँ गीली मिट्टी में लोटने जाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे यहाँ ये परम्परा न जाने कितनी पुरानी है। जुड़ शीतल के दिन लोग गीली मिट्टी में एक दूसरे को सराबोर कर देते हैं; इसके पीछे का एक कारण यह है कि इस से शरीर ठण्डा रहता है और इन्सान आने वाले गर्म मौसम और लू के थपेड़ों से बचने के लिए खुद के शरीर को तैयार कर लेता है। ये हमें याद दिलाता है कि हम सब की काया एक दिन इसी मिट्टी मे मिल जायेगी अतःजमीन से जुड़े रहें, संतुष्ट रहें। साथ ही यह उत्सवी तरीके से जल संसाधनों की सफाई का भी सामुदायिक तरीका था। यह त्योहार स्वच्छता, जल संरक्षण के साथ-साथ प्रकृति से जुड़ने व ‘वसुधैव-कुटुंबकम्’ की भावना को अपने अन्दर समाहित किये हुए है। वक़्त के साथ हम अपने लोक त्योहारों और रीति रिवाजों से विमुख होते जा रहे हैं, और इसका सीधा प्रभाव हमारे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता जा रहा है।
नदियों की सफाई से भी जुड़ी है परंपरा
वर्तमान समय में स्वच्छता का प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श का बड़ा हिस्सा बना है। नदियों की साफ सफाई के लिए व्यापक स्तर पर मुहिम चालाए जा रहे हैं। जुड़ शीतल का त्योहार साफ सफाई से जुड़ा एक त्योहार भी है। इस दिन जल श्रोतों को साफ किया जाता था, और आस पास सड़क मुहल्लों की स्वच्छता का विषेश ध्यान रखा जाता था। ‘थैंक्स गिविंग डे’ तो आपने खूब सुने अथवा मनाए होंगे पर ये त्योहार हमारे मिथिलांचल का ‘थैंक्स गिविंग डे’ ही है। जहाँ बासी खाना स्वास्थ की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है वहीं एक मान्यता है साल भर बाद चूल्हे को आराम देना, शुक्रिया कहना। इस दिन चूल्हे की पूजा भी विषेश तौर पर की जाती है। आज के दिन हम शुक्रिया अदा करते हैं प्रकृति का, पेड़-पौधों का और यहाँ तक कि चूल्हे का भी जिससे हमारा अस्तित्व बना हुआ है। यह उनका अंधविश्वास नहीं, बल्कि ‘रेड अलर्ट’ पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक डेनियल वाइल्डकैट के शब्दों में कहें तो यह ‘इंडिजेनस-रीअलिस्म; है, जिसमें भावनात्मक रूप से जीवन के यथार्थ को जीया जाता है।
लेखक- आकांक्षा पाठक, परास्नातक, मिथिला विश्विद्यालय, दरभंगा