देवरिया। भारतीय लोक संगीत की प्रसिद्ध लोक गायिका, बिहार कोकिला शारदा सिन्हा का निधन भोजपुरी लोक संगीत के युग का अंत माना जा सकता है। बिहार के सुपौल जनपद के हुलास गांव में जन्मी शारदा सिन्हा ने अपनी मधुर आवाज से भारतीय लोक संगीत को एक नया आयाम और पहचान दी है। छठ पर्व बिना शारदा सिन्हा के गीत के पूरा नहीं होता है। छठ के अवसर पर समय में 72 वर्ष की आयु में शारदा सिन्हा का आकस्मिक निधन से संगीत जगत में शोक की लहर फैल गयी।

विदेशों में भी पसंद किए जाते हैं शारदा सिन्हा के गीत

शारदा सिन्हा की गायीकि में न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की लोक संस्कृति और सभ्यता की महक बसती है. भारत के साथ ही साथ गिरमिटिया देश, जहां पर आजादी के पूर्व भारत से रोजगार के लिए लोगों का पलायन हुआ, वहां भी उनके गीतों का बहुतायत में पसंद किया जाता है. फिजी, सूरीनाम, मारीशस विकसित राष्ट्र जैसे अमेरिका में भी भारतीयों के घरों में उनके गीत सुने और गुनगुनाये जाते हैं. भारतीय सभ्यता और संस्कृति को वैश्विक मंच प्रदान करने में शारदा सिन्हा का जो स्थान है वह लोक संगीत के क्षेत्र में शायद ही किसी कलाकार हो.

बिहार कोकिला बनने तक का सफर

संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाली शारदा सिन्हा ने साल 1974 में पहली बार अपना भोजपुरी गाना गाया था, लेकिन इस गाने से उन्हें ज्यादा फायदा नहीं हुआ। इसके बाद फिर साल 1978 में उन्होंने छठ गीत ‘उग हो सुरुज देव’ गाया। इस गीत ने शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद से उनके करियर की बेहतरीन शुरुआत हो गई थी। शिक्षा की बात करें तो शारदा सिन्हा ने  मगध महिला कॉलेज, प्रयाग संगीत समिति और ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी की है। उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। इसके साथ ही साथ वह समस्तीपुर के महिला महाविद्यालय में संगीत विभाग की प्रोफेसर रहीं थीं। इसके बाद संगीत वे यहीं इसी विभाग की अध्यक्ष भी बनीं। गायिका ने कई स्टूडेंट्स का मार्गदर्शन किया था।

रुढिवादी समाज का सामना कर अपनाया संगीत

लोक गायिकी के क्षेत्र में ऐसा मुकाम हासिल करना उस दौर में संभव नहीं था. शारदा सिन्हा के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं थी. बिहार के संभ्रांत परिवार से सम्बन्ध रखनी वाली शारदा सिन्हा जब मंच पर गायन के लिए आई तो उस दौर में महिलाएं मंचों पर गायन नहीं करती थी. शारदा सिन्हा ने तमाम चुनौतियों से लड़कर यह मुकाम हासिल किया है. उन्होंने भोजपुरी में बिन्ध्यवासिनी देवी के बाद गीतों के जरिये लोक संस्कृति को आगे लाने की हिम्मत दिखाई. अपनी माटी से प्रेम के कारण वह कई बार मुंबई से बुलावा आने के बावजूद कभी भी नहीं गयी. उन्होंने भोजपुरी लोक संगीत को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाया और आज उसी का परिणाम है कि हर घर में उनके गीत त्योहारों के अवसर प्र गए जाते हैं.

बॉलिवुड में भी दी अपनी आवाज

भोजपुरी लोक संगीत के अलावा शारदा सिन्हा द्वारा गाए गए गीत हिन्दी सिनेमा में भी बहुत पसंद किए गए. उन्होंने 1989 में आई फिल्म मैंने प्यार किया के गीत “काहे तोसे सजना” गाकर सबका दिल जीत लिया था. इसके अलावा गैंग्स आफ वासेपुर में उनके गाए “तार बिजली से पतले हमारे पिया” और हम आपके हैं कौन का “बाबुल जो तुमने सिखाया” जैसे गीत उनकी मधुर आवाज का प्रमाण हैं। इन गीतों ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए।

पद्म भूषण से सम्मानित हैं शारदा सिन्हा

वर्ष 2018 में शारदा सिन्हा को लोक गायिकी के लिए भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था. इसके साथ ही साथ उन्हें 1991 में पद्मश्री अवॉर्ड, साल 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, वर्ष 2006 में राष्ट्रीय अहिल्या देवी अवॉर्ड, साल 2015 में बिहार सरकार ने बिहार सरकार पुरस्कार, बिहार कोकिला, भोजपुरी कोकिला, भिखारी ठाकुर सम्मान, बिहार रत्न, मैथिलि विभूति से सम्मानित किया.

शारदा सिन्हा की सांसे भले ही थम गयी हैं लेकिन छठ पर्व, विवाह, होली जैसे अवसरों पर हमेशा ही शारदा सिन्हा की आवाज घरों में गूंजती रहेगी. एक कालजयी रचना की तरह हर त्यौहार पर यह आवाज लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाती रहेगी.

लेखक- डॉ. उमेश कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय, जनसंचार एवं नवीन मीडिया विभाग