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कौन हैं बाबा भोजपाली जिन्हें मिला राम मंदिर से निमंत्रण, क्या है इनका अनोखा संकल्प

देवरिया। अयोध्या मेंराम मंदिर के निर्माण के लिए बहुत से नेताओं, संत और महात्माओं ने संघर्ष किया है। सभी को लंबे समय से राम मंदिर बनने की आस थी। अब जब उनके साथ पूरे देशवासियों का सपना पूरा हो रहा है, ऐसे में उन सभी संतों को 22 जनवरी को होने वाले राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है। इन्हीं महान संतों में मध्यप्रदेश के बैतूल के रहने वाले एक संत हैं भोजपाली बाबा। भोजपाली बाबा ने राम मंदिर के निर्माण होने तक के लिए एक अनोखा संकल्प लिया था। आमंत्रण भेजे जाने के बाद से ही भोजपाली बाबा और उनका संकल्प चर्चा का विषय बना हुआ है। आइए जानते हैं बाबा ने ऐसा कौन सा संकल्प लिया था और क्या मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद उनका यह संकल्प पूरा हो जाएगा।


अब पूरी होगी 31 साल पहले ली गई यह प्रतिज्ञा
बाबा भोजपाली ने 31 साल पहले, जब वह सिर्फ 21 साल के थे राम मंदिर को लेकर एक संकल्प लिया था, कि जब तक अयोध्या में राम लला के लिए मंदिर का निर्माण नहीं हो जाता वो शादी नहीं करेंगे। आज पूरे 31 सालों बाद उनकी प्रतिज्ञा पूरी होने जा रही है जब22 जनवरी को राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है। उन्होंने अपना यह कठिन संकल्प पूरी निष्ठा से पूरा किया है उन्होंने अभी तक शादी नहीं की है। राम मंदिर ट्रस्ट की तरफ से उन्हें भी राम लला की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण भेजा गया है।


1992 में कार सेवक के रूप में दी थी सेवा
बाबा भोजपाली बैतूल के रहने वाले हैं और उनका असली नाम रवींद्र गुप्ता है। 1992 में जब विवाद चल रहा था तब बाबा भोजपाली अयोध्या आए थे। उन्होंने कार सेवक रके रूप में सेवा भी दी थी। प्रभु श्री राम में उनकी आस्था इतनी सच्ची थी कि उन्होंने 21 साल की उम्र में ही मंदिर नहीं बनने तक शादी नहीं करने का संकल्प ले डाला और उसे सच्चे मन से निभाया भी। इस बीच दोस्त और परिवार वालों ने कई बार उनपर शादी करने का दबाव डाला लेकिन श्री राम के प्रति उनकी आस्था ने उन्हें अपने संकल्प पर कायम रखा।


निमंत्रण पाकर बेहद खुश हैं बाबा भोजपाली
निमंत्रण मिलने पर बाबा भोजपाली काफी खुश हैं उनका कहना है कि उन्होंने नहीं सोचा था कि उन्हें न्योता मिलेगा। अब उनके शिष्य और गांव के लोग उनके अयोध्या जाने की तैयारी कर रहे हैं। मूल रूप से भोपाल से ताल्लुक रखने वाले बाबा भोजपाली संन्यासी बनने के बाद बैतूल आ गए और पिछले 10 सालों मिलानपुर में गांव में रहकर भगवान की सेवा और सनातन धर्म के प्रचार प्रसार में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बाबा का संकल्प तो पूरा हो गया है लेकिन अब उन्होंने आगे का जीवन भी अविवाहित रहने का फैसला किया है।


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