देवरिया। गर्मी का मौसम आया नहीं कि देशभर से पानी की किल्लत की खबरें आने लगती हैं। जलाशय सूखने लगते हैं और भूजल स्तर तेजी से गिरने लगता है। ग्लोबल वॉर्मिंग और तेजी से कटते पेड़ों की वजह से बारिश के मौसम में उतनी बारिश नहीं हो पाती जिससे गर्मियों में गिरा हुआ जलस्तर और सूखे जलाशय लबालब हो सके और फिर ग्रीष्म ऋतु आ जाने से जल्द ही जलाशयों का पानी सूखने लगता है और भूजल स्तर गिरने लगता है। प्राकृतिक बारिश से जमा होने वाले पानी और पूरे साल दोहन किए जाने वाले पानी का संतुलन बिगड़ चुका है।


जल आयोग की रिपोर्ट चिंताजनक
अप्रैल का महीना बीतने से पहले ही कर्नाटक के सभी बड़े जलाशयों का 75% पानी सूख गया है। ज्यादातर जलाशयों में उनकी क्षमता का 25% से कम पानी मौजूद है। यह हाल सिर्फ कर्नाटक की ही नहीं है। पूरे देश में जलाशय सूख रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 7 बड़े जलाशय पूरी तरह सूख गए हैं। इनमें से 6 दक्षिण भारत में हैं। वहीं 150 बड़े जलाशयों में उनकी क्षमता का 30% पानी भी नहीं बचा है।


कम बारिश, तेज गर्मी जल संकट की वजह
इस साल देश के आधे हिस्से में औसत से कम बारिश होने की वजह से जलाशय पहले से ही पूरे भर नहीं पाए थे। गर्मी की वजह से और ज्यादा पानी की कमी हो गई। लगातार 29 हफ्तों से जलाशयों का पानी कम होता जा रहा है। पिछले साल इसी समय जलाशयों में उनकी क्षमता का करीब 82% पानी उपलब्ध था। अगर 10 साल का औसत देखा जाए तो अप्रैल के महीने में भारत के बड़े जलाशयों में 96% पानी उपलब्ध रहता रहा है।


बिहार और आंध्र प्रदेश के हालात सबसे खराब
जल संकट के मामले में पूरे देश में बिहार और आंध्र प्रदेश की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। हालात यह है कि बिहार के जलाशयों में 3% पानी भी नहीं बचा। वहीं आंध्र प्रदेश के जलाशयों में अब तक सिर्फ 7% पानी ही उपलब्ध है। पानी की यह स्थिति देखते हुए जाहिर सी बात है खरीफ की फसल की समय से बुआई हो पाना संभव नहीं नजर आ रहा है। जल संकट सिर्फ पीने के पानी की समस्या लेकर नहीं आता बल्की पूरे कृषि चक्र को प्रभावित करता है।