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Ashtavinayak Darshan: सिद्धीविनायक क्यों हैं अष्टविनायक में सबसे खास?

देवरिया। अष्टविनायक मंदिर दर्शन (ashtavinayak darshan) में दूसरे नंबर परसिद्धिविनायक मंदिर को स्थान दिया गया है। यह मंदिर पुणे से लगभग 200 किलोमीटर दूर अहमदनगर जिले के सिद्धटेक नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर भीमा नदी के किनारे बसा हुआ है। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण लगभग 200 साल पहले हुआ था। अष्टविनायक दर्शन की यात्रा पर निकले श्रद्धालु, मयुरेश्वर गणपति के दर्शन के बाद सिद्धिविनायक के दर्शन के लिए आते हैं। गणेश उत्सव के दौरान 10 दिनों तक यहां भारी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

खास है मंदिर की बनावट

  • यह मंदिर पहाड़ की चोटी पर स्थित है।
  • मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है।
  • गणेश जी की मूर्ति लगभग 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी है।
  • अष्टविनायक (ashtavinayak darshan) में सिद्धिविनायक ही एकमात्र ऐसी मूर्ति है जिनकी सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जो इसे अद्वितीय बनाता है।

सिद्धिविनायक से जुड़ी मान्यता

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इसी सिद्धटेक की पहाड़ी पर तप करके अनेक सिद्धियां प्राप्त की थीं। ऐसा विश्वास है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना गणपति के आशीर्वाद से पूरी होती है। इसी कारण इस गणपति को सिद्धिविनायक कहा जाता है। भक्त यहां अपनी इच्छापूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।

मंदिर निर्माण का इतिहास

सिद्धिविनायक मंदिर के प्रारंभिक निर्माण के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, वर्तमान स्वरूप में मंदिर का पुनर्निर्माण इंदौर की रानी देवी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। मंदिर की विशेषताएं कुछ इस तरह हैं-

  • मंदिर काले पत्थरों से बना है।
  • गर्भगृह 10 फीट चौड़ा और 15 फीट ऊंचा है
  • मंदिर का मुख उत्तर दिशा की ओर है।
  • बाद में मंदिर परिसर में कई छोटे-छोटे निर्माण भी हुए, जिन्हें अलग-अलग लोगों ने कराया है।

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