देवरिया न्यूज़

लूडो-कैरम खेलना, छत पर सोना, संतरे की गोलियां, बहुत याद आती हैं गर्मी की छुट्टियां

बचपन के दिन भी क्या दिन थे…उड़ते फिरते तितली बन के…सुजाता फिल्म का ये गाना तो आपने सुना ही होगा। सच में बचपन तितली जैसा होता है। चंचलता से भरा हुआ। इधर-उधर बिना किसी फिक्र के फिरते रहने वाला। जब हम छोटे होते हैं, तो बड़े होकर ना जाने क्या-क्या बनने के सपने देखते हैं। ख्वाब बुनते रहते हैं कि बड़े होकर ये करेंगे, वो करेंगे। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे लगता है अल्हड़ थे, अक्ल के कच्चे थे लेकिन सच्चे थे, बहुत प्यारे थे वो दिन जब हम बच्चे थे। मासूमियत की उस गली की कुछ ऐसी यादें हैं, जो हम कभी भुला नहीं पाएंगे और टेक्नोलॉजी के दौर में बच्चे दुहरा भी नहीं पाएंगे। आइए रिकॉल करते हैं अपनी चाइल्डहुड मेमोरीज को और सोचते हैं कि आज के बच्चों को उन यादों के गलियारों में कैसे घुमाया जाए।


छोटी-छोटी चीजों में बड़ी-बड़ी खुशी
बचपन महंगे गिफ्ट्स से नहीं बल्कि छोटी-छोटी चीजों में खुश हो जाता था। कभी संतरे की गोली में, तो कभी चूरन के पैकेट में, कभी चकरी वाली टॉफी भाई-बहन बांटकर खा लेते थे। ये चीजें ही हमें खुश करने के लिए काफी होती थीं। लेकिन समय के साथ बचपन भी बदल गया है । पहले के बच्चों खासकर लड़कों का गेम होता था सायकल के पुराने चक्के घुमाना, कंचे और गिल्ली-डंडा खेलना। लड़कियां मां की साड़ी लपेटकर घर-घर खेलती थीं और गुड्डे-गुड़ियां की शादी करके खुश हो जाती थीं। खो-खो, बर्फ-पानी जैसे खेल भी लोकप्रिय थे।


गर्मी की छुट्टियों का होता था इंतजार
बच्चे सालभर गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करते कि कब परीक्षा खत्म हो और छुट्टियां बिताने नाना-नानी के घर जाएं। छुट्टियों में मामा-मौसी, बुआ सबके बच्चे इकट्ठा हो जाते थे। लूडो, सांप-सीढ़ी, कैरम मनोरंजन और सबके साथ बैठकर खेलने का जरिया हुआ करते थे। सबके साथ छत पर सोना, फोन की घंटी बजते ही कॉल रिसीव करने के लिए दौड़ पड़ना ये सब बहुत प्यारा अनुभव होता था। पहले तो पूरा मोहल्ला एक घर होता था। वो बचपन ऐसा था कि जिंदगी भर के लिए सुनहरी यादें जेहन में रह गई।


बदलते वक्त ने बदल दिया बचपन
समय के साथ बहुत सी चीजों में बदलाव आया और बचपन का भी रूप बदल गया। आज बच्चे गिल्ली-डंडा या कंचों से नहीं खेलते, उनको वीडियो गेम्स और मोबाइल में ज्यादा रुचि है। आज के दौर में बच्चों पर पढ़ाई का बहुत ज्यादा बोझ डाल दिया गया है। बस्ते के बोझ के नीचे बच्चे खुलकर अपना बचपन नहीं जी पा रहे हैं। स्कूल की टाइमिंग पहले से बढ़ गई। बच्चा जब घर वापस लौटता है उसे खेलने या आराम करने का समय नहीं मिलता क्योंकि उसे ट्यूशन, ड्रॉइंग, स्वीमिंग या और कोई क्लास जानी होती है। ऐसे में बच्चा ना तो मन भर कर खेल पाता ना ही मां-बाप बच्चे को समय दे पाते हैं। ऐसी दिनचर्चा की वजह से बहुत से बच्चों को अकेले रहने की आदत हो जाती है। इतना ही नहीं अब स्कूलों में पहले जैसे लंबी छुट्टियां भी नहीं होती कि बच्चे नाना-नानी या दादा-दादी के घर जाएं।


बच्चों को छुट्टियों में आप याद दिलाइए अपना बचपन
आजकल एकल परिवार लोगों की मजबूरी बन गए हैं। घर में माता-पिता और एक या दो बच्चे बस इतने ही सदस्य होते हैं। ऐसे में भी बच्चों को वैसे बचपन का अनुभव नहीं हो पाता जो कि पहले संयुक्त परिवारों में रहने वाले बच्चे करते थे। बचपन तो एक बार गुजर गया तो दोबारा नहीं आएगा इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने बच्चों को भी उस दौर का अनुभव कराएं। पूरे साल नहीं तो कम से कम गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को समय दें। उन्हें घुमाने अपने पुराने गांव लेकर जाएं या वहां लेकर जाएं जहां आपने अपना बचपन बिताया है। उन्हें अपने बचपन के किस्से सुनाएं कि कैसे-कैसे आप अपने बचपन को एंज्वॉय करते थे। आज के बच्चों के लिए कंचे, गुल्ली डंडा बहुत मजेदार गेम होगा, उनके साथ कुछ समय के लिए खेल कर देखें, बच्चों को तो मजा आएगा ही आप भी दोबारा अपना बचपन जी लेंगे।

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