देवरिया। एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि दुनिया में सबसे ज्यादा रिसर्च पेपर चीन के वैज्ञानिक पब्लिश करा रहे हैं। साल 2017 में चीन ने पहली बार रिसर्च की दुनिया में अमेरिका, जर्मनी जैसे देशों को पीछे छोड़ यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था। तबसे माना जा रहा था कि चीन विज्ञान और तकनीक की दुनिया में जल्द ही अमेरिका को पीछे छोड़ सबसे आगे निकल जाएगा, लेकिन अब ऐसा होता नजर नहीं आता। क्योंकि चीन के वैज्ञानिकों द्वारा पब्लिश किए गए की शोध पत्र फेक पाए गए हैं।
खारिज हो रहे चीन के रिसर्च पेपर
दरअसल चीन के वैज्ञानिक फेक रिसर्च कर रहे हैं। वे दूसरों की रिसर्च के डेटा में जोड़-तोड़ कर अपना रिसर्च पेपर पब्लिश करा रहे हैं, या फिर पहले पब्लिश रिसर्च पेपर के कुछ चैप्टर्स बदलकर अपने नाम से पब्लिश करा रहे हैं। यही वजह है कि चीन के वैज्ञानिकों की रिसर्च छपने के बाद भी कई शोध जर्नल ने खारिज कर दिए और उन्हें रिट्रैक्ट (वापस लिया) किया। अमेरिका की गैर लाभकारी संस्था क्रॉस रीफ ने 50 हजार फेक रिसर्च पेपर का डेटाबेस तैयार किया है। इसमें से 46% अकेले चीन के हैं।
भारत में सबसे कम प्लैगरिज्म
शोध पत्रिका नेचर के अनुसार, साल 2003 से 2022 तक सबसे ज्यादा फेक रिसर्च पेपर सऊदी अरब के वैज्ञानिकों ने पब्लिश कराए। इसके बाद दूसरे नंबर पर हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान था। इसके बाद रूस और चीन की बारी आती है। दुनिया में सबसे ज्यादा शोध करने वाले देशों में भारत में सबसे कम प्लैगरिज्म होता है। शोध पत्रिका नेचर द्वारा तैयार की गई दुनिया के 8 देशों की लिस्ट में भारत आखिरी नंबर पर आता है। पहले नंबर पर सऊदी अरब, दूसरे नंबर पर पाकिस्तान, तीसरे नंबर पर रूस, चौथे नंबर पर चीन, पांचवें नंबर पर मिस्र, छठे नंबर पर मलेशिया, सातवें नंबर पर इरान और आठवें नंबर पर भारत आता है।
दरअसल पैसे और प्रमोशन के लिए वैज्ञानिक फेक रिसर्च कर रहे हैं। दरअसल चीन में रिसर्च पेपर की क्वालिटी की बजाय संख्या गिनी जाती है। उसी आधार पर रिसर्च के लिए फंडिंग होती है और प्रमोशन मिलता है। इसलिए वैज्ञानिक फेक रिसर्च खूब कर रहे हैं।
चीन के रिसर्च पेपर की समीक्षा करने से मना कर रहे वैज्ञानिक
दुनिया के कई वैज्ञानिक चीन के वैज्ञानिकों के रिसर्च पेपर की समीक्षा करने से मना कर रहे हैं। फेक रिसर्च पर काम कर रही माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट एलिजाबेथ बिक कहती हैं- कई रिसर्च पेपर तो पैसे लेकर तैयार किए जाते हैं। कई में पूरा प्लैगरिज्म ही होता है। एक चीनी पेपर में प्रोस्टैट कैंसर पर रिसर्च की गई थी। इसमें कहा गया था कि रिसर्च में 50% सैंपल महिलाओं के हैं, जबकि महिलाओं में प्रोस्टैट ग्लैंड्स होते ही नहीं हैं।