देवरिया। पूरे देश में गणेश चतुर्थी के दिन गणपति जी की स्थापना हो चुकी है। देश के गली, चौराहों, नुक्कड़ में छोटे-बड़े गणपति जी विराजित हो चुके हैं। इन दस दिनों में स्थापित किए गए गणपति की मूर्ति की तो सेवा होती ही है साथ ही अष्टविनायक के अलग-अलग 8 मंदिरों में भी अलग ही रौनक देखने को मिलती है। क्या आप जानते हैं ये अष्टविनायक किन्हें कहा जाता है? इनके मंदिर कहां-कहां पर स्थापित है? आइए हम आपको बताते हैं अष्टविनायक मंदिर किन्हें कहा जाता है और इनमें सबसे पहले किनके दर्शन किए जाते हैं।
किन्हें कहा जाता है अष्टविनायक?
भगवान गणेश के आठ अलग-अलग रूपों को एक साथ अष्टविनयाक कहा जाता है। ये सभी रूप अलग-अलग मंदिरों में विराजित हैं और ये सभी आठों मंदिर पुणे के आस-पास ही स्थित है। जैसे 12 ज्योतिर्लिंगों का अपना-अपना क्रम है वैसे ही अष्टविनायक दर्शन का भी क्रम निर्धारित है। मान्यता है कि इनमें से किसी भी मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया है बल्की सभी प्रतिमाएं स्वयंभू हैं। इस बात का प्रमाण अलग-अलग पुराणों में भी देखने को मिलता है।
मयूरेश्वर गणपति का स्थान है सबसे पहला
अष्टविनायक में मयूरेश्वर गणपति के दर्शन सबसे पहले किए जाते हैं। ये मंदिर महाराष्ट्र के पुणे से 80 किलोमीटर दूर मोरगांव में स्थापित है। यह मंदिर बेहद खूबसूरत है, मंदिर के चार कोनों पर चार सुंदर मीनारें बनी हुई है। दीवारों का निर्माण लंबे पत्थरों से किया गया है। मंदिर में चार युगों- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग को दर्शाते हुए चार दरवाजे बने हुए हैं।
नंदी से जुड़ी है रोचक कथा
मयूरेश्वर मंदिर के ठीक सामने एक नंदी विराजित देखे जा सकते हैं, जिनका चेहरा गणेश जी की मूर्ति की तरफ ही है। कहा जाता है ये नंदी शंकर जी का ही है। एक बार भगवान शिव अपनी सवारी नंदी पर सवार होकर सैर पर निकले थे और घूमते-घुमते मयूरेश्वर पहुंचे। थकने पर दोनों ने यहीं पर आराम करने का सोचा और वहीं बैठ गए। लेकिन बाद में नंदी जी ने वापस जाने से मना कर दिया और हमेशा के लिए भगवान गणेश की मूर्ति के सामने स्थापित हो गए।
मयूरेश्वर गणपति की खासियत
इस मंदिर में नंदी और गणेश जी की सवारी मूषक, दोनों ही द्वारपाल के रूप में विराजमान हैं। यहां स्थापित गणपति जी स्वयंभू हैं और बैठी हुई मुद्रा में दिखाई देते हैं। उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई है, साथ ही चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में मूर्ति का आकार छोटा था, लेकिन निरंतर सिंदूर चढ़ाने से यह समय के साथ बड़ी प्रतीत होती है। कथा के अनुसार, यहीं पर गणेश जी ने मयूर की सवारी कर राक्षस सिंधुरासुर का वध किया था। तभी से वे इस स्थान पर मयूरेश्वर गणपति नाम से पूजित होते हैं।