देवरिया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की रहने वाली 28 वर्षीय दिव्या सिंह ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। उन्होंने साइकिल से 17,560 फीट ऊंचे एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचकर इतिहास रच दिया। दिव्या ऐसा करने वाली भारत की पहली और दुनिया की दूसरी महिला बन गई हैं। 24 मार्च 2026 को माइनस 12 डिग्री तापमान में उन्होंने तिरंगा फहराकर अपने इस सपने को पूरा किया।
बचपन का सपना बना हकीकत
गांव के साधारण माहौल में पली-बढ़ी दिव्या ने बचपन में ही बड़ा सपना देख लिया था। जब वह सातवीं कक्षा में थीं, तभी उन्होंने ठान लिया था कि एक दिन एवरेस्ट की ऊंचाइयों को छुएंगी। उस समय लिया गया यह संकल्प ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी नजर नहीं हटाई।
कोच के मार्गदर्शन से मिली दिशा
दिव्या के इस सफर में उनके कोच उमा सिंह का अहम योगदान रहा। वे खुद कई बार एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। उनके मार्गदर्शन में दिव्या ने अपनी तैयारी को सही दिशा दी और कठिन चुनौतियों का सामना करने का हौसला पाया। कोच ने न सिर्फ तकनीकी ट्रेनिंग दी, बल्कि मानसिक मजबूती भी विकसित की।
डेढ़ साल पहले लिया बड़ा फैसला
करीब डेढ़ साल पहले जब दिव्या एवरेस्ट क्षेत्र में गई थीं, तब उन्हें पता चला कि अब तक कोई महिला साइकिल से बेस कैंप तक नहीं पहुंची है। बस यहीं से उन्होंने ठान लिया कि वह यह रिकॉर्ड अपने नाम करेंगी। उसी दिन से उन्होंने खुद को इस चुनौती के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।
कठिन ट्रेनिंग से खुद को बनाया मजबूत
इस मिशन के लिए दिव्या ने देश के अलग-अलग पहाड़ी इलाकों में कड़ी ट्रेनिंग की। माउंट आबू, हिमाचल प्रदेश और नेपाल की ऊंची पहाड़ियों पर साइक्लिंग कर उन्होंने अपने शरीर और मन दोनों को मजबूत बनाया। ऊंचाई, ठंड और कठिन रास्तों में अभ्यास ने उन्हें इस बड़ी चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार कर दिया।
14 दिन का खतरनाक सफर
दिव्या ने 16 मार्च को काठमांडू से अपनी यात्रा शुरू की। उन्होंने सलेरी, सुरखे, फाकडिंग, नामचे बाजार, सागरमाथा नेशनल पार्क, लोबुचे और गोरखशेप जैसे कठिन रास्तों को पार करते हुए 24 मार्च को एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने में सफलता पाई। यह पूरा सफर 14 दिनों में पूरा हुआ, जहां हर दिन नई मुश्किलें सामने आईं।
मौसम बना सबसे बड़ी चुनौती
इस यात्रा के दौरान मौसम ने कई बार मुश्किलें बढ़ाईं। लगातार बर्फबारी, तेज ठंडी हवाएं और माइनस तापमान ने रास्ता और कठिन बना दिया। कई जगहों पर रास्ते इतने खराब थे कि दिव्या को अपनी साइकिल कंधे पर उठाकर चलना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
90% सफर कंधे पर साइकिल
दिव्या ने बताया कि इस यात्रा का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा उन्होंने साइकिल कंधे पर उठाकर तय किया, जबकि सिर्फ 10 प्रतिशत दूरी ही साइकिल चलाकर पूरी कर पाईं। ग्लेशियर, कम ऑक्सीजन और कठिन चढ़ाई के बीच यह सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा।
रोज 10-12 घंटे की मेहनत
हर दिन उन्हें 10 से 12 घंटे तक लगातार मेहनत करनी पड़ती थी। 11 किलो वजन के साथ ऊंचाई पर चलना आसान नहीं था। ऑक्सीजन की कमी और तेज धड़कनों के बावजूद उन्होंने खुद को संभाला और आगे बढ़ती रहीं।
सादा जीवन, सख्त डाइट
दिव्या पूरी तरह शाकाहारी हैं। उन्होंने अपनी डाइट में गुड़-चना, दाल, चावल, रोटी, सब्जी, दूध और ड्राई फ्रूट्स को शामिल किया। कठिन ट्रेनिंग और यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखा।
पढ़ाई और पैशन दोनों में आगे
दिव्या ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस और होम साइंस में डबल मास्टर डिग्री हासिल की है। इसके साथ ही उन्होंने डीएलएड, सीटेट और टेट भी पास किया है। वह मानती हैं कि हर इंसान के लिए पैशन और प्रोफेशन दोनों जरूरी होते हैं।
परिवार का मिला पूरा साथ
दिव्या की सफलता के पीछे उनके परिवार का बड़ा योगदान रहा। उनकी मां शिक्षिका हैं और पिता खेती के साथ नौकरी भी करते हैं। परिवार ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया, जो उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
महिला सशक्तिकरण का संदेश
दिव्या की इस उपलब्धि का उद्देश्य सिर्फ रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना भी है। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती।
देश का नाम किया रोशन
एवरेस्ट बेस कैंप पर तिरंगा फहराकर दिव्या ने देश को गर्व का मौका दिया। अब उनका सपना और भी ऊंची चोटियों को फतह कर नए रिकॉर्ड बनाना है।
ये भी पढ़ें-UP Weather: 35 जिलों में आंधी, बारिश और ओलावृष्टि का ऑरेंज अलर्ट