कोलकाता। पश्चिम बंगाल का जंगल महल यानी 4 जिले- झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर। इन जिलों में करीब 8-9 लाख भूमिज आदिवासी रहते हैं। इनकी भाषा भूमिज है, जो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। समुदाय के लोग अपनी ही भाषा भूल गए थे। बांग्ला और दूसरी भाषा बोलने लगे थे। इसके बाद साल 2018 से इस समाज के लोगों ने अपनी भाषा बचाने की मुहिम शुरू की।
70 स्कूलों में अलग से लगाई क्लास, स्लेबस का बनाया हिस्सा
अपनी मातृभाषा और संस्कृति को विलुप्त होने से बचाने के लिए भूमिज आदिवासी समुदाय के लोगों ने वेस्ट बंगाल आदिवासी भूमिज डेवलपमेंट बोर्ड का गठन किया। साल 2018 से भूमिज भाषा को बचाने के लिए काम कर रहे बोर्ड के प्रेसिडेंट नित्यलाल सिंह कहते हैं, ” साल 2018 से हमने अपनी भाषा को बचाने की मुहीम शुरू की। पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाका यानी झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर सहित पूरे राज्य में ही भूमिज समुदाय के 8-9 लाख लोग रहते हैं। मगर भूमिज समुदाय के लोग खुद की भाषा को भूलते जा रहे हैं। युवाओं को खुद की भाषा से रूबरू करवाने और भाषा को विलुप्त होने से बचाने के लिए हमने चार जिलों में 70 से ज्यादा स्कूल खोले हैं। कुछ स्कूल पक्के घरों में तो कुछ पेड़ के नीचे चलायी जा रही हैं। बाकी जिलों के भूमिज समुदाय के लोगों को ऑनलाइन के जरिये भाषा की शिक्षा दी जा रही हैं। दरअसल, हमने देखा कि रोजाना अपनी भाषा का इस्तेमाल नहीं होने से हमारी भाषा विलुप्त होती जा रही हैं, इसलिए हमने शिक्षा के माध्यम से अपनी भाषा को बचाने की मुहीम शुरू की। इसका कारण यह हैं कि मौखिक तौर पर बोलने से भाषा एक समय के बाद विलुप्त हो जाएगी लेकिन अगर इसे शिक्षा में शामिल कर लेंगे तो ये कभी विलुप्त नहीं होगी।”
अब तक 50 हज़ार से ज्यादा लोगों को दी गई भूमिज भाषा की शिक्षा, हर शनिवार व रविवार को होती है पढ़ाई
नित्यलाल बताते हैं, ” जंगलमहल इलाके से दूर रहने वाले हमारे लोग भूमिज भाषा को पूरी तरह भूल चुके हैं। उन्होंने बांग्ला व अन्य भाषा को अपना लिया हैं। हमारा उद्देश्य दोबारा इन्हें अपनी भाषा को याद करवाना हैं। 70 स्कूलों में हर शनिवार व रविवार को पढ़ाई होती हैं। वहीं बाकी जिलों में हम ऑनलाइन के जरिये पढ़ा रहे हैं. यहां पढ़ने वालों की कोई उम्र तय नहीं होती हैं। यहां 10 साल से लेकर 80 साल के बुजुर्ग पढ़ाई करते हैं। हालांकि टीचर की उम्र 25 साल से ज्यादा होनी चाहिए। हमारे स्कूल में टीचर बिना किसी श्रमिक के पढ़ाते हैं. पिछले 8 सालों में हम 50 हज़ार लोगों को भूमिज भाषा की शिक्षा देने में सफल हो पाए हैं। इनमें करीब 30 हज़ार युवा शामिल हैं। हमारा उद्देश्य यह भी हैं कि ये 50 हज़ार लोग और 50 हज़ार लोगों को शिक्षित करें जिससे भूमिज भाषा को विलुप्त होने से बचाया जा सकें। इसके साथ ही 8 साल बाद पहली बार इन स्टूडेंट्स की परीक्षा ली गयीं हैं ताकि हम देख सकें कि इन्होंने कितना सीखा हैं और ये अब दूसरों को शिक्षित करने के काबिल हैं या नहीं।
3 साल से भूमिज सिखा रहा हूं
बांकुड़ा जिले के बाउड़ीदिहा गांव के रहने विकास पातोर एक किसान हैं, लेकिन अब वे बच्चों व बुजुर्गों को पिछले 3 साल से भूमिज भाषा सीखा रहे हैं। विकास कहते हैं, ” बांकुड़ा के अलावा मैं पुरुलिया में भी भूमिज भाषा सिखाता हूं। शनिवार व रविवार दो -दो घंटे बच्चों व बुजुर्गों को पढ़ाता हूं। उन्हें रोजाना इस्तेमाल होने वाले वाक्य, फलों, सब्जियों सहित कई चीज़ों के नाम भूमिज भाषा में बतायी जाती हैं। उदाहरण के तौर पर भूमिज भाषा में भात (राइस) को माड़ी, जल को दा, आम को ऊली, चाय को लोलोदा कहते हैं. इसी तरह बांग्ला, हिंदी या इंग्लिश में बोली जानी वाली चीज़ों को भूमिज भाषा (bhoomij language) के मुताबिक बताया जाता हैं ताकि वे रोजाना अपनी भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं और उसे बचाकर रखें।

पश्चिम बंगाल में भूमिज समुदाय के लोग वयस्कों को भी अपनी भाषा सिखा रहे हैं।
साल 2023 में ग्रेजुएट हुई पुरुलिया जिले के बन्दोयान के पूंशा गांव की रहने वाली हिमानी सिंह पिछले 3 साल से अपनी मातृभाषा “भूमिज भाषा “की पढ़ाई कर रही हैं। हिमानी कहती हैं, ” हमारे यहां कोई भूमिज भाषा में बात नहीं करता था इसलिए मुझे भी अपनी भाषा नहीं आती थी. मगर जब मुझे पता चला कि हमारी अपनी भाषा भूमिज और लिपि ओल ओनल हैं तब साल 2022 से मैंने शनिवार व रविवार क्लास अटेंड करना शुरू किया. मुझे ना सिर्फ अपनी भाषा, लिपि के बारे में पता चला बल्कि हमारा गौरवशाली इतिहास, सभ्यता, संस्कृति व रीति – रिवाज के बारे में जानकारी मिली जिससे मैं काफ़ी प्रभावित हुई. गत 13 जुलाई को मैंने परीक्षा दी जिसमें मैं अच्छे नंबर लेकर आयी. अब मैं अपने जैसे अन्य लोगों को भूमिज भाषा की शिक्षा दूंगी.”
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